लघुकथा : "तर्पण "
गाने के बोल उसके नयनों पर भारी पड़े बहुत भारी, जिसके दबाव कों वो बर्दास्त नही कर पाई और धारा बहनें लगी |
"बाबा की रानी हूँ,आँखों का पानी हूँ,
बह जाना है जिसे, दो पल कहानी हूँ |
अम्मा की बिटिया हूँ, आंगन की मिटिया हूँ,
टुक-टुक निहारे जो, परदेसी चिठ्ठियाँ हूँ | "
पूरे परिवार के बेटे - बहु के स्टेटस में पितृ दिवस पर हो रहे विशाल समारोह की तस्वीरों से फ़ोन सजा था | जीते जी माता -पिता कों तर्पण देने वाली आँगन की कुंवारी बिटिया कों किसी ने नही पूछा , न ही किसी प्रत्यक्षदर्शी ने याद किया लेकिन उसे तो तर्पण का असली मतलब कच्ची उम्र से पता था |
घर की छोटी , मन की अबोध बिटिया भरे नयनों से माँ -पापा की तस्वीरों के पास जाकर खड़ी हो गई और एक प्यार की झप्पी की आस लगाए माँ से बोली----
" माँ ज़ब तुम्हारे पाँव टूटे, तुम किसके सहारे खड़ी हुई? ज़ब तुम कुर्सी से गिरी तुम्हें कौन संभाला, तुम्हारे मुँह में बच्चे की तरह निवाले कौन डालता था? तुम्हारे कपड़े धोकर बचपन का कर्ज कौन अदा किया? तुम्हारे अंतिम दिनों में तुम्हारे आंख खोलने के इंतजार में अस्पताल के बाहर कुर्सी पर बैठकर रात कौन बिताया ? "
जवाब के इंतजार में वो टुकुर -टुकुर माँ की तस्वीर निहारती रही,माँ के होंठ नही हिले |
माँ की खामोशी उसे बिन पानी की मछली की तरह तड़पा गई, वो पुनः बोली ---
"एक बार तो सच बोलो माँ एक बार! औरो की तरह तुम तो खामोश न रहो ! तुम तो हमेशा से सच के लिए लड़ी माँ फिर आज चुप क्यों हो? एक बार सच बोल दो माँ | "
माँ की चुप्पी से मिले घाव का मरहम शायद पापा के पास हो, इसी उम्मीद में वो पापा की तस्वीर कों भरी अँखियो से निहारी और बोली ---
आप हर एक डॉ के पास जाकर यही कहते थे न पापा ---
"मेरी ये बेटी मेरा हाथ पाँव हैँ, मेरी बुढ़ापे की लाठी हैँ | आज आपकी लाठी कों आपकी ऊंगलियों की जरूरत हैँ |
आप तो मेरे अच्छे वाले पापु थे, आप तो जरूर सच बोलोगे, ये मुझे विश्वास हैँ | "
पापा की गुड़िया मुस्कुराती हैँ और एक नादान बच्चे की भांति कहती हैँ ---
"मुझे पता हैँ! आप मुझे सता रहे हैँ | ज़ब आप अस्वस्थ थे, मैं आपको जबरदस्ती मेवें का हलवा घुटवाती थी | आप कभी मुझपर गुस्सा होते, कभी मेरें निश्छल प्यार पर हँसते और गाते थे "---
"मुस मोटहिए लोढ़ा होइए "
पापा की तस्वीर से भी कोई आवाज़ नही आई तभी मुंडेर पर बैठे कागा महाराज रोटी की गुहार लगाने लगे |
बिटिया समझ गई |
जीते जी दिए हुए तर्पण की कोई तस्वीर नही होती न कोई गवाह होता, चेहरे पर परेशानियों की लकीरें होती लेकिन मरने के बाद देने वाले तर्पण की अनगिनत तस्वीर होती, खुशियों से दमकते चेहरे होते |
जीते जी माता -पिता कों देने वाले तर्पण पर बेटों का अधिकार हो न हो लेकिन मरने के बाद देने वाले तर्पण पर पूत -कपूत दोनों का अधिकार हैँ |
- तनुजा सिन्हा , पटना, बिहार

