काव्य :
झोपड़ी में जो हों खुशियाँ...
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इंजी. अरुण कुमार जैन
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अंधेरा मन का मिट जाये, दीवाली तो तभी होगी,
उदासी, हर्ष बन जाये,
दीवाली तो तभी होगी. हजारों दीप बंगलों में,
जलाने से न कुछ होगा,
झोपड़ी में जो हो खुशियाँ,
दीवाली तो तभी होगी. अंधेरा..........
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फटेहाली व गंदे में,
सालों से जो जीते हैं, डूबे कर्ज में सिर तक, बीमारी से घिरे जो हैं,
निराशा, वेदना मन में,
भीतर गहरी बैठी है,
उन्हें सुख,शांति अनुभव हो
दीवाली तो तभी होगी.
अंधेरा मन....
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गाँव में दूर घर जिनका,
न बिजली और पानी है,
जिन्हें दुत्कार मिलती है, खुशियाँ भी बेमानी हैं,
तरसते रोटी, कपड़ो को,
अभी भी जिनके बच्चे हैं,
हों खुशियाँ उनकेआँचल में,
दीवाली तो तभी होगी.
अंधेरा मन........
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सैनिक हों वो सीमा पर, टनल में काम जो करते,
श्रमिक मिल और खेतों के,
व सीवर लाइन के बन्दे,
जो जेलों में हैं बरसों से,
तरसते न्याय पाने को,
सभी उल्लास में झूमें, दीवाली तो तभी होगी.
अंधेरा मन.......
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ज़रा से शौक के खातिर, हम उनके प्राण लेते हैं,
मिटा देते हैं हस्ती को,
सहज ही रौंद देते हैं,
उन्हें पैदा किया प्रभु ने, रहें आनंद से वो भी,
जल, थलचर भी मुस्काएँ,
दीवाली तो तभी होगी.
अंधेरा मन........
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लें दीपक व चलें उन तक,
अंधेरा मन में व तन में,
अटकती साँसे हैं जिनकी, सहारा है नहीं जग में,
सहारा बन उन्हीं सब का,
ह्रदय संतुष्टि दे पाएं,
सभी पर हो कृपा प्रभु की,
दीवाली तो तभी होगी.
अंधेरा मन का....
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