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काव्य : भगवत गीता -अध्याय बारहवाँ- भक्ति योग - रानी पांडेय , रायगढ़ छत्तीसग



काव्य : 

 भगवत गीता -अध्याय बारहवाँ-

भक्ति योग 

अर्जुन के पूछे जाने पर

कृष्ण ने व्याख्या की है। 

साकार-निराकार भक्ति में 

सर्वश्रेष्ठ सिद्धी साकार की है।

देहधारियो के लिए निराकार

भक्ति में प्रगति दुष्कर भी है।

करो भक्ति योग का अभ्यास ,

ये ना हो तो मेरे लिए करो कर्म 

यदि इसमें भी असमर्थ हो तो ,

अपने समस्त कर्म फल त्याग करो 

समाज,राष्ट्र,समुदाय के लिए उत्सर्ग 

यह भी ना हो तो ज्ञान काअर्जन करो 

ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान,ध्यान से श्रेष्ठ कर्म 

-फलों का त्याग अर्थात्‌ 

कर्म फल अच्छे कार्य मे लगाना ।

अर्जुन ने पूछा ,प्रभु भक्त का व्यवहार 

अपनों के प्रति, दूसरों के प्रति, समाज 

के प्रति,भगवानके प्रति कैसा होताहै?

 कृष्ण कहते हैं-दोष ना निकाले, 

द्वेष ना रखे,अपनी गति जाने,

जो खुद को स्वामी ना माने, 

मिथ्या अंहकार से परे ,भक्ति से भरे,

सबसे मैत्री भाव ,बुरी संगति से दुराव,

संगति में प्रभु की चर्चा,भक्तोकी सेवा जो करता ,संसार की घटनाओं से ना

विचलित होता ,वह जो

हर परिस्थिति में रहता है शांत,

स्वीकारता सब परस्थितियों को 

मान भगवान का दिया वरदान।

अपने कार्य में निपुण है वो,

मेरे ह्रदय के करीब है जो।

आस्था उसकी कम ना होती कभी

चाहे काल की कैसी भी होती गति।

मेरी प्राप्ति ही जिनका जीवन लक्ष्य 

वही प्रिय मेरा,वही मेरा भक्त। 


- रानी पांडेय 

रायगढ़ छत्तीसगढ ।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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