काव्य :
*रुप चौदस*
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सज धज श्री शक्ति खड़ी हैं
दीपमालिका थाली सजाये;
हैं डाल पल्लू प्रकाश करतीं
रुप चौदस चंद्रमुख छुपाए।
तोरण अशोक,आम्र पल्लव
झुक कर खड़ी हैं कदलिका;
ज्योति कलश सजे द्वार पर
अभ्यागता लक्ष्मी सागरिका।
आयेंगी धन धान्या देवी रत्ना
गृहस्थी को बनाने सुख धाम;
स्वाद,चक्षु,स्पर्श,ध्वनि से परे
वरदान देंगी प्रणव प्रतिसाद।
श्री लक्ष्मी की कृपा वर्षण से
वैभव उत्स मय प्रारब्ध होगा;
इहलोक से परलोक जाते हुए
पुण्य फल धन उपलब्ध होगा।
नरकासुर वध कर सत्यभामा
श्री हरि की श्री शक्ति बनी थी;
दाम्पत्य में भार्या धर्म निभाने
विकल्प योद्धा बन खड़ी थीं।
आह्वान कर दीपो दीवा भव
दीप से जला दीपक सजाने;
श्री शक्ति,शिव,रामत्व जगाने
पुरा संस्कृति सनातन बचाने।
-अंजनी कुमार'सुधाकर' ,बिलासपुर
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