काव्य : आकिंचन माटी उद्धारक...
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इंजी.अरुण कुमार जैन
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शरद पूर्णिमा आयी फिर से,
पर आलोक नहीं है,
पूर्ण चंद्र की धवल ज्योति भी, आभाहीन बनी है.
आठ माह पहिले ही युग का, सूरज डूब गया था,
तप, करुणा, सेवा व त्याग का,शिखर विलीन हुआ था.
पूज्य समय सागर ससंघ,
संरक्षण में हम बढ़ते हैं,
सेवा,सदकार्यों की ज्योति,
नित आलोकित करते हैं.
श्रेष्ठस्वर्ग से आशीष नित प्रति, निश्चित ही देते हैं,
तभी सभी जन हर्षित होकर सदपथ पर चलते हैं.
प्रखर दिव्यता, दिव्य नयन, मुस्कान याद आती है,
चरणकमल,कर आशीषों की, स्मृति ही थाती है.
दिव्य वाणी महावीर सी चर्या,जड़,चेतन के उपकारी,
आकिंचन माटी उद्धारक, विनती सुनें हमारी.
प्रतिभा स्थली, हथकारधा, शांतिधारा विकसित हों,
पूर्णायु, भाग्योदय, दयोदय,
जन- जन के संबल हों.
कुण्डलपुर, माड़िया जी, अमरकंटक, तीर्थ मुस्काएँ.
चंद्रगिरी, रामटेक, नेमावर, सबको पथ दर्शाएं.
युगों युगों तक पथ दर्शन दें,
संबल, संरक्षण देना,
चरणों के अनुगामी हम हों,
दृन शक्ति, साहस देना.
भारत भू पर सत्य, अहिंसा, सेवा, करुणा मुस्काये,
कर्तव्य, त्याग, साधना सुरभि, हर मन ज्योति जलाये.
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अमृता हॉस्पिटल, फ़रीदाबाद, हरियाणा,
मो. 7999469175

