काव्य :
काश!!! लौट आए गुजरी बहार
पीढ़ी दर पीढ़ी
बेहिचक एकमेव रहे
संयुक्त *परिवारों* की
एकजुटता का नाम है
*कुटुंब*।
बड़े छोटे का लिहाज़
रिश्तों की मर्यादा
निजहितों की तिलांजलि
अपनापन,
सदस्य कई,मगर धड़कन एक...।
हंसी ठिठोली मीठी बोली...
और इरादे नेक..।
बहस जिरह से परे
जिम्मेदारियों के साथ
कर्तव्यों का बोध
जहां होता नहीं किरदारों में
वैचारिक अवरोध...।
जहां कोई जताता नहीं
अपना-अपना हक..
जहां करता नहीं कोई
विभाजन की बातें
फिर चाहे गुजारी हों उन्होंने
फांकों में कई रातें..।
जहां निकलते हों
आपसी समझ बूझ से
समस्याओं के हल...।
जहां आता नहीं हो कभी
किसी माथे पर बल..।
उसी आंगन/प्रांगण में
फहराती है सदैव ही
एकता की ध्वजा...।
हर हाल में खुशहाल रहती है
पारिवारिक प्रजा...।
मगर अफसोस,
स्वार्थ के अंधेरों में
गुम हो चुकी हैं अब
अतीत की ये प्यारी सी झलकियां...।
दिखाई देती हैं परिवारों में अब
तल्ख़िया ही तल्ख़िया...।
सच में अब तो,
तनाव खिंचाव अलगाव और
जोर आजमाइशों का दौर है...।
नया जमाना है,
सबका अपना अपना ठिकाना है...।
वर्तमान में तो
वर्चस्व है एकल परिवारों का..
नहीं होता मेल किनारों का..।
काश!!!!
उस दौर में
हम फिर से लौट पाएं
न हो किसी विषय पर
आपस में तकरार...।
लौट आए फिर से जीवन में
महकती चहकती
गुजरी हुई बहार...।
हो जाए फिर से एक
बिखरा हुआ *परिवार*
- चरणजीत सिंह कुकरेजा ,भोपाल

