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काव्य : महान नहीं थे पिता - श्रीराम निवारिया , इटारसी


 काव्य : 

महान नहीं थे पिता

 - श्रीराम निवारिया , इटारसी


बेटे-बेटियाँ नहीं हो सकते

गुणों से अलग पिता के

पिता पेड़ खजूर के गुण वाला होगा

तो वह गुड़ बनाने का गुण रखेगा ही

लेकिन नीम की गहरी छाया रहित हो ही सकता है


हमें गुड़ के गुण वाले पिता नहीं मिले

नीम के गुण वाले पिता की छाया में पले

गल्ती हो जाने पर 

पटक दिए जाते थे हम कभी-कभी 

उठाकर ज़मीन पर 

जैसे निम्बोली को पटकता है नीम 


उनके पेंट में जेबें तो बनी होती थी

लेकिन असिंचित ज़मीन की तरह

सूखा पड़ा रहता था उनमें

जिसका असर पूरे परिवार को

हरे-भरे होने से दूर रखता था


एकाध मजदूर के साथ

पिता के नेतृत्व में

पूरे परिवार ने ही मिलकर 

खोद लिया था कुआँ

जिसका साफ-ठण्डा पानी पिया हमने

और दस-बीस घरों के लोग 

भरके ले जाते थे पानी


अर्थ के अभाव ने

ऐसा कंजूस बना दिया पिता को

कि झूठ बोलने में भी कंजूसी करते

ऐसी कंजूसी से घर के अंदर 

खुशियाँ और सुख

आने से साफ इंकार कर देते

लेकिन कठोर पिता को

हमारे अभावों का कोई अफसोस नहीं


कौन से देवता का आशीर्वाद मिला था उन्हें

कभी-कभी बाजार से चवन्नी के चने लाते थे

और इतने सधे हाथों से

भाई-बहनों को बाँटते थे बराबर 

मानों कोई अदृश्य तराजू हो हाथ उनके


ऐसा होने पर भी वे

लोगों में अप्रिय नहीं हुए

मोहल्ले की कीचड़ भरी सड़क से

पड़ोस के किसी भी बीमार पुरुष को

सौ मीटर दूर  पक्की सड़क पर खड़े रिक्शे तक

वे पीठ पर बैठाकर पहुँचा देते थे


इस तरह के जीवन ने पिता को

कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वासी-आत्मनिर्भर 

बल्कि कहें अभिमानी बना दिया था

ऐसा होना मैंने महसूस किया


हरी-भरी गहरी छाया की तरह

व्यक्तित्व वाले पिता में

अभिमान एक सूखी डाली की तरह था

इसीलिए वे हमारे लिए तो

गहरी-ठण्डी छाया, औषधि थे

पर महान नहीं थे पिता ।

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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