काव्य :
मान भी जाओ,आज जाओ ना
///////////////पूर्णिका///////////
मान भी जाओ,आज जाओ ना।
देखो फिर आज यू सताओ ना।
मौन होकर चले कहां उठकर,
बात क्या है ,भला बताओ ना ।
तुमने मेरे लिए लिखे खत जो,
अपने दिल दर्द वह सुनाओ ना।
मेरे दिल में जो दर्द तुमने दिया,
सह गया अब तो भूलजाओ ना।
दर्द सहने की पड़ गई आदत,
दर्द देने का हक, निभाओ ना।
किस तरह तुमको मनाऊँ साथी,
न समझ आए,कुछ बताओ ना।
जीत हासिल कभी मुझे न हुयी,
हार दिल तुम,मुझे जिताओ ना ।
बात अब मुझसे कुछ नही बनती,
बात आकर के तुम बनाओ ना ।
एक निर्मल की बात की खातिर,
क्या कहूं अब तो मान जाओ ना ।
- सीताराम साहू"निर्मल"छतरपुर म प्र
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