काव्य :
ग़ज़ल
ख़्वाब अपना कोई तोड़ना मत कभी।
हिम्मतो हौसला छोड़ना मत कभी।
जिन के किर दार में बेवफ़ा ई बसे,
उनसे रिश्ता कोई जोड़ना मत कभी।
दर्द अपना संँजो कर हमे शा रखो,
दर्द हांडी कहीं फोड़ना मत कभी।
कोई नाता न रख ना कभी झूठ से,
साथ सच का कहीं छोड़ना मत कभी।
जिस की मंज़िल ज़रा यार भाती न हो,
एक पल रुख उधर मोड़ना मत कभी
- हमीद कानपुरी
अब्दुल हमीद इदरीसी
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