शिक्षा में नैतिकता का महत्त्व
मानव ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है क्योंकि जगत् में समस्त जीवों में वह ही एकमात्र अपनी संवेदनाओं को भाषा के माध्यम से प्रेषित करने में सक्षम है। परन्तु मानव में मानवीय गुणों का परिष्कार और संस्कार शिक्षा के द्वारा ही संभव है।
शिक्षा मानव जीवन की महत्त्वपूर्ण इकाई है। यह मनुष्य को जीवन की चुनौतियों का कुशलता से सामना करने के लिये तैयार करती है। शिक्षा के द्वारा मनुष्य को सभ्य, सुसंस्कृत व योग्य नागरिक बनाया जाता है। यह मनुष्य के नकारात्मक विचारधाराओं को हटाकर सभी प्रकार के मानवाधिकारों, देश के प्रति कर्त्तव्यों और दायित्वों को समझने में हमारी सहायता करती है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि वह शिक्षा कभी भी लाभप्रद नहीं हो सकती जो मात्र बौद्धिक स्तर पर है और जिसका हृदय व भावनाओं सम्बन्ध नहीं है।
आज शिक्षा के विकास के नाम पर कृत्रिमता का बोलबाला हो गया है। अध्यापक और शिष्य के सम्बन्ध में संवेदना, गुरुभक्ति, वात्सल्य व संस्कार का लोप होता जा रहा है। गूगल, यू-ट्यूब और कृत्रिम टीचर (ए॰आई॰) के माध्यम से शिक्षा का प्रसार किया जा रहा है। इन माध्यमों में संवेदना और छात्रों के चारित्रिक विकास का ह्रास हो रहा है।
विद्यालय या गुरुकुल में जिस शिक्षा पद्धति के द्वारा शिक्षा दी जाती है, उससे छात्रों में विषयों के ज्ञान के साथ-साथ व्यक्तित्व निर्माण भी होता है। गुरु या अध्यापक उनके लिये प्रेरणास्रोत होते हैं। अध्यापिकाएँ कभी माता के समान स्नेह देती हैं तो कभी दण्ड के द्वारा उनकी त्रुटियों को सुधारती हैं। छात्रों का ऐसा चारित्रिक विकास कृत्रिम शिक्षा के माध्यम से सम्भव नहीं है।
शिक्षा का नैतिक मूल्य सम्मत होना अत्यन्त आवश्यक है। नीतिपरक शिक्षा मनुष्य का सम्पूर्ण विकास करती है। नैतिकता का मुख्य उद्देश्य अपना एवं दूसरों का कल्याण करना होता है। ऐसी शिक्षा से युक्त व्यक्ति अपनी हानि करके भी दूसरों का कल्याण करता है। यह गुण समाज के लिये बड़ा महत्त्वपूर्ण है, सम्भवतः इसीलिये गोस्वामी तुलसीदास ने "रामचरितमानस" में लिखा है - "परहित सरिस धर्म नहि भाई ।" अर्थात् परोपकार के सदृश श्रेष्ठ धर्म नहीं होता है और जो मनुष्य को कर्त्तव्य - अकर्त्तव्य का बोध कराये वही धर्म है। नैतिक उत्थान के बिना संसार भौतिक उन्नति तो कर सकता है किन्तु वह भौतिक उन्नति अन्ततः संसार के लिये विनाशकारी ही होगी। अतः यह आवश्यक है कि भौतिक विकास मात्र भौतिक विकास न होकर नैतिकता से युक्त विकास होना चाहिए। भौतिक वस्तुओं का आविष्कारक मनुष्य यदि नैतिक और धार्मिक होगा तो उसके अविष्कार मानवीय कल्याण के लिये होंगे, विनाश के लिये नहीं। क्योंकि नीति से परिपूर्ण धर्म व्यक्ति को सन्मार्ग की शिक्षा देता है, कुमार्ग का नहीं। सम्भवतः इसीलिये कहा भी गया है -
" यतो धर्मस्ततो जयः।"
यह अत्यन्त सन्तोष एवं गर्व का विषय है कि हमारे विद्यालय सन्त अन्थोनी कॉन्वेण्ट गर्ल्स इण्टर कॉलेज में छात्राओं को नीतिपरक शिक्षा प्रदान की जाती है। हमारे विद्यालय में उनके एक अच्छे डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, अधिकारी के साथ-साथ एक अच्छी गृहिणी व योग्य नागरिक बनने पर बल दिया जाता है। कनोसियन धर्मबहनों द्वारा संचालित यह संस्था इस वर्ष सौ वर्ष पूर्ण कर अपनी शिक्षिकाओं के साथ मिलकर संस्थापिका सन्त मगदलीन के स्वप्न को निरन्तर साकार कर रहीं हैं।
दूरदर्शी सन्त मगदलीन के अनुसार विद्यालय की बालिकाओं के लिये धर्म, नैतिक शिक्षा एवं प्रार्थनाओं के महत्त्व को जानना अपने पाठ्यक्रम के विभिन्न विषयों के ज्ञान के समान ही अत्यन्त आवश्यक होता है। उत्कृष्ट चरित्र का निर्माण और सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास होने पर ही ये छात्रायें संस्कारित परिवार एवं सौहार्दपूर्ण समाज के निर्माण में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकेंगी।
-डॉ० उपासना पाण्डेय , प्रयागराज

