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काव्य : मेरी खामोशी - डा.नीलम , अजमेर


 काव्य  : 

मेरी खामोशी

खामोशियों को मेरी खुदकुशी न समझें
लबों पे ठहरे हैं शिकवे
बयां हो गये
तो रुसवाई होगी
आँख की कोर पर
ठहरी बूँद
लम्हों का हिसाब
माँगेगी
खुली जुल्फों का
क्या राज है
बता न पाओगे
क्या छपा है मेरे चेहरे पर जान न पाओगे।

बस जान लो 
के जिंदगी है तो
जिंदा हूँ
अपनी बर्बादी की
लाश काँधे पर
लिए
कभी तुम्हारी अपनी
थी पर
शर्मिंदा हूँ
ढूँढती हूँ अपने ही
भीतर अपने को
खो चुकी हूँ
कहीं अस्तित्व अपना
इन प्यार के तंगदिल
गलियारों में
चाहती हूँ जो दे
न पाओगे।

चलती है साँसें
मगर 
अफसोस के घूँट
पी-पी कर
हैरान हूँ
धड़कनों के बेगानेपन
पर
इक रुह ही तो
थी अपनी
छोड़ आई हूँ वो भी
उल्फत के
दरवाजे पर
बस जिंदा लाश बनी
उम्र की दहलीज
पर बैठी हूँ
जानती हूँ जमाने की
दीवार न लांघ
पाओगे।

    - डा.नीलम , अजमेर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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