व्यंग्य आलेख :
बलि का बकरा
"बलि के बकरे" दो प्रकार के होते हैं, एक वह जिनकी बलि दी जाती हैं, और दूसरे वे होते हैं जो खुद ही कटने को तैयार रहते हैं। जिनकी बलि देनी होती है,उनको पहले अच्छा खिलाया-पिलाया जाता है, वे भ्रम में रहते हैं, हमारा मालिक बहुत दयालु है, काजू किशमिश खिला रहा है, माला पहना रहा है, नजर उतार रहा है, और घर के बच्चों से भी ज्यादा ध्यान रख रहा है, बच्चे भी उस मोटे तगड़े बड़े अब्बा को बड़ा प्यार करते हैं। उन बकरों की आँखों पर मोटा चश्मा लगा होता है। वह नहीं पहचान पाते कि मुझे बलि के लिए तैयार किया जा रहा है।
दूसरे बकरे वह होते हैं जो यह कहते हैं आँधी आए, तूफान आए,दफ्तर में फाइल गायब हो जाए, स्कूल का रिज़ल्ट खराब आ जाए, कोई बड़ी बिल्डिंग गिर जाए या ब्रिज गिर जाए, हमेशा यह कहते हैं,
"मैं हूँ ना"
वे हमेशा बिकने को तैयार रहते हैं,या कोई न कोई खरीदने को तैयार रहता हैं। हाँ भाई बकरों का भी बाजार लगता है वे बिक जाते हैं, लक्ष्मी के बदले अपनी किडनी, अपना खून और अपना ईमान।
"बलि का बकरा" एक अद्भुत प्राणी है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह स्वयं गलती करे या न करें, गलती का बोझ उठाने के लिए सदैव तत्पर रहते है। बड़े साहब का निर्णय गलत निकले तो जिम्मेदारी छोटे कर्मचारी की, मंत्री की योजना विफल हो जाए तो दोष छोटे अधिकारी का, और यदि अधिकारी भी बच निकलें तो जनता तो है ही, जिस पर हर असफलता का ठीकरा फोड़ा जा सकता है।
दफ्तरों में "बलि का बकरा" बनना किसी पदोन्नति से कम नहीं माना जाता। वहाँ उनका नाम "बॉस का चमचा" रखा जाता है और बॉस उसे कब बलि पर चढ़ा दे, वह खुद भी नहीं समझ पाता जो कर्मचारी जितना सीधा-सादा और कम बोलने वाला होता है,उसके बलि का बकरा बनने की संभावना उतनी ही अधिक होती है।
मीटिंग में बड़े अधिकारी गंभीर स्वर में पूछते हैं,
"यह गलती किसकी है?"
कमरे में सन्नाटा छा जाता है,फिर सबकी निगाहें एक ही व्यक्ति पर टिक जाती हैं, मानो उसे पहले से इस महान जिम्मेदारी के लिए चुना गया हो।
राजनीति में तो बलि का बकरा लोकतंत्र का पाँचवा स्तंभ बन चुका है। चुनाव हारने पर नेता कहते हैं कि जनता समझ नहीं पाई। चुनाव जीतने पर कहते हैं कि जनता ने उनकी दृष्टि को पहचान लिया। यहाँ बलि का बकरा कभी विपक्ष बनता है, कभी मीडिया और कभी सहयोगी।और अगर कुछ समझ न आए तो "इस ज़माने" को बलि का बकरा बना दो। यह सबसे सुरक्षित विकल्प है क्योंकि "ज़माना" कभी सफ़ाई देने नहीं आता।
अब प्रश्न यह उठता है — क्या कभी असली दोषी "बलि का बकरा" बनता है?
"नहीं"।
क्योंकि असली दोषी के पास तीन चीज़ें होती हैं जो बकरे के पास नहीं होतीं-
*पैसा, पहुँच और पटूता*।
घर-परिवार में भी इस प्रजाति की भरमार है। यदि चाय में चीनी कम हो जाए तो बीबी जिम्मेदार,बिजली का बिल बढ़ जाए, बीबी के सीरियल जिम्मेदार, यदि कोई वस्तु गुम हो जाए तो बीवी की सफाई जिम्मेदार,उसे "बलि का बकरा" घोषित कर दिया जाता है।और मज़े की बात यह है कि बकरा हमेशा तैयार मिलता है। जैसे उसने पहले से ही डेथ फॉर्म भर रखा हो — "मैं बलि का बकरा बनने का इच्छुक हूँ। अनुभव: शून्य। योग्यता: बेगुनाही।"
"बेचारे बकरे की माँ बड़ी चिंतित रहती है। सुबह उठते ही अपने लाल को देखती होगी और सोचती होगी-
"हे भगवान! आज का दिन भी निकल जाए बस।"
उस कहानी के समान जिसमें राजा शेर रोज एक जानवर को अपने भोजन के लिए भेजने के लिए आदेश देता है जो उसके भोजन के लिए जाता है वह "बलि का बकरा" बन जाता है और जो बच जाता है। उसकी माँ सोचती होगी, आज जान बची कल की कल देखी जाएगी। परंतु हमें पहले से तैयार रहना चाहिए कि हम किसी के चंगुल में फंसकर "बलि का बकरा" ना बन जाए।
इस प्रकार, "बलि का बकरा" हमारे समय का सबसे व्यस्त, सबसे उपयोगी और सबसे उपेक्षित पात्र है — जो हर गलती का भार उठाता है, पर किसी सफलता का श्रेय कभी नहीं।
तो अगली बार जब कोई आपको प्यार से देखे, ज़रा सोचिएगा —
कहीं वो रस्सी तो नहीं ढूँढ रहा?
- सुधा दुबे , भोपाल
16 सुरुचि नगर कोटरा रोड भोपाल 9407554249
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