काव्य :
उन्हें पूछना जाकर
गीत
नई अमीरी की शेखी को
अंटी में धर लाले।
चाटे तलवे जिनके तूने
उन्हें पूछना जाकर
पुश्तैनी आदर्श डिगे हैं
कब लालच में आकर
लड़े लड़ाई यहाँ मूँछ की
इज्ज़त के रखवाले।
जि़ल्लत गले लगाकर तूने
दौलत खूब कमाई
पीड़ा की छाती पर चढ़कर
छल ने धूम मचाई
दिखे नहीं क्यों निष्ठाओं के
पड़े पाँव में छाले।
विलासिताएँ दिखा चुकी हैं
कितने खूनी मंजर
आज लाजवंती सोचों की
कोख हुई है बंजर
हाय दर्प ने बीज ज़हर के
मन -भीतर बो डाले।
यहाँ न लोभी इच्छाओं के
होंगे पूरे सपने
जा तू धन-बल की माला को
कहीं और अब जपने
जाने कितने तुझ जैसों से
पड़े हमारे पाले।
- उपमेंद्र सक्सेना, एडवोकेट
' कुमुद- निवास', बरेली
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