सरोकार :
निजी हाथों में जा रहे 9 मेडिकल कॉलेज अब सरकारी ही बने रहेंगे
निजी हाथों में गए आईटीआई से छात्र हैं परेशान
-डॉ. चन्दर सोनाने ,उज्जैन
राज्य सरकार द्वारा मध्यप्रदेश के 9 सरकारी मेडिकल कॉलेजों को निजी हाथों में सौंपने का मीडिया में चौतरफा विरोध होने पर सरकार ने हाल ही में फैसला लिया है कि अब ये सरकारी मेडिकल कॉलेज निजी हाथों में नहीं सौंपे जायेंगे। जिन मेडिकल कॉलेजों के भवन तैयार हैं या निर्माणाधीन है, उन्हें सरकारी ही रहने दिया जायेगा। अर्थात उन्हें पीपीपी मॉडल से बाहर रखा जायेगा। राज्य सरकार का ये फैसला जनहित में लिया गया फैसला है। इसकी सराहना की जानी चाहिए।
पिछले दिनों राज्य सरकार जिन सरकारी 9 मेडिकल कॉलेजों को पीपीपी मॉडल पर निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर चुकी थी, उनमें से बुधनी, छतरपुर और दमोह के कॉलेजों के भवन तैयार हो चुके हैं और वहां कॉलेज भी संचालित किए जा रहे हैं। उज्जैन, मंडला और राजगढ़ मेडिकल कॉलेजों के भवन निर्माणाधीन हैं।
इसके साथ ही नीमच, श्योपुर और सिंगरोली के मेडिकल कॉलेज केन्द्र की प्रवर्तित योजना से संचालित है। अब इन सभी मेडिकल कॉलेजों का संचालन पूर्ववत राज्य सरकार ही करेगी। हेल्थ कॉर्पोरेशन ने ट्रांजेक्शन एडवाइजर के लिए निकाला टेंडर भी निरस्त कर दिया है। देखा जाए तो यह एक तरह से मीडिया की जीत है, जिसने जनहित का यह मुद्दा उठाकर सरकार को अपना निर्णय वापस लेने के लिए बाध्य कर दिया है !
राज्य सरकार द्वारा एक ओर सराहनीय निर्णय लिया गया है, वह यह कि पूर्व में प्रदेश के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को भी निजी हाथों में सौंपने का निर्णय लिया था, उसे भी निरस्त करते हुए यह निर्णय लिया गया है कि ये सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र भी अब सरकारी ही रहेंगे अर्थात, इन्हें भी अब किसी निजी हाथों में नहीं दिया जायेगा। इस प्रकार राज्य सरकार द्वारा ग्रामीणों की स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी फिर से ध्यान रखा गया है।
किन्तु अभी भी पेंच फंसा हुआ है। सरकार ने अब यह निर्णय लिया है कि प्रदेश के ऐसे प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज, जिनके भवन अभी बने नहीं है और न ही उनका निर्माण कार्य शुरू हुआ है, उनके लिए सरकार नीति आयोग के तैयार टेंडर डॉक्यूमेंट लागू करेगी। राज्य सरकार का यह मानना है कि जरूरत के अनुसार वायबिलिटी गैप फंडिंग (बीजीएफ) से परियोजना को व्यवहारिक बनाने में मदद करेगी।
किन्तु उक्त प्रश्न भविष्य के गर्भ में छिपा होने के बावजूद खतरनाक है। इससे सरकार को बचना चाहिए और जनहित को सबसे ऊपर रखना चाहिए, जिसे मद्देनजर रखकर राज्य सरकार ने 9 सरकारी मेडिकल कॉलेजों को पीपीपी मॉडल पर देने के निर्णय को वर्तमान में समाप्त कर दिया है। सरकार को प्रस्तावित योजना पर भी पुनर्विचार करना चाहिए और आमजन के हितों का संरक्षण करना चाहिए।
सरकार ने पूर्व में जिन सरकारी संस्थाओं को पीपीपी मॉडल पर निजी संस्थाओं को सौंप रखा है, उसकी हालात का जायजा एक उदाहरण से लेते हैं। करीब 4 वर्षों पूर्व राज्य सरकार ने प्रदेश के 42 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) को निजी संस्था को सौंपने का निर्णय लिया था। अब इन आईटीआई संस्थाओं की वर्तमान में हालत यह है कि 4 साल पहले जिस आईटीआई में छात्रों की फीस 10,680 रूपए ही थी, वह अब बढ़कर डेढ़ लाख रूपए तक पहुंच गई है। इसलिए फीस चुकाने के लिए कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों को बैंक या साहूकारों से लोन भी लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
इतना ही नहीं इन संस्थाओं को जब पीपीपी मॉडल पर निजी हाथों में सौंपा गया था, तब ये वादा किया गया था, कि यहाँ के छात्रों को 100 प्रतिशत प्लेसमेंट मिलेगा, किन्तु यह वादा भी पूरा नहीं हुआ। वर्तमान में 30 प्रतिशत प्लेसमेंट भी पूरा नहीं हो पाया है। इसके साथ ही इन संस्थाओं में जो आधुनिक ट्रेड शुरू करने थे, वो तो हुए ही नहीं, बल्कि कुछ पुराने और चल रहे ट्रेडों को बंद भी कर दिए गए। इस प्रकार इन आईटीआई संस्थाओं को निजी हाथों में सौंपने के जो सपने दिखाए गए थे, वे किसी प्रकार भी पूरे नहीं हुए !
उक्त शिकायतें किसी द्वारा बताई गई नहीं है, बल्कि सरकार द्वारा बनाए गए गैर सरकारी परम फाउंडेशन को पहले चरण में सौंपे गए 10 आईटीआई की जांच से सामने आई है। इन संस्थाओ से मिल रही लगातार शिकायतों के बाद कौशल विभाग एवं रोजगार विभाग ने उक्त संस्थाओं की जांच कराई थी। जांच टीमें को मौके पर कई खामियाँ मिली है। उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने मई 2022 में आईआईटी के पूर्व छात्रों के साथ मिलकर परम फाउंडेशन बनाया था। इसे प्रदेश की कुल 42 आईटीआई दी जानी है। इस परम फाउंडेशन को धारा 8 नॉट फॉर प्रॉफिट के अन्तर्गत संयुक्त सामाजिक उद्यम के रूप में बनाया गया है। इसमें 40 प्रतिशत हिस्सेदारी मध्यप्रदेश के उपक्रमों की है और 60 प्रतिशत पीएआरएफआई की है। इस पीएआरएफआई को आईआईटी के पूर्व छात्रों ने बनाया है।
इसमें खास बात यह है कि विभाग परम फाउंडेशन को प्रति आईटीआई 3 करोड़ 50 लाख रूपए भी दे रहा है। इस परम फाउंडेशन को आईटीआई पहले 15 साल के लिए दी गई है। फिर 5-5 साल बढ़ाकर अधिकतम 35 साल का समय तय किया गया है। किन्तु जांच में कहीं से भी यह नहीं लगता की परम फाउंडेशन ने उनसे किए गए अनुबंध के अनुसार काम किया, बल्कि उसने इन आईटीआई को लाभ प्राप्त करने का धंधा बना लिया ! इसलिए राज्य सरकार को जांच के आधार पर तुरन्त इस संस्था से किए गए अनुबंध को समाप्त कर देना चाहिए और वापस इन आईटीआई को सरकार द्वारा ही चलाया जाना चाहिए, जिससे विशेषकर गरीब छात्रों को उसका वाजिब लाभ मिल सके।
शिक्षा और स्वास्थ्य दो ऐसे महत्वपूर्ण विषय हैं, जिन्हें आमजनों को उपलब्ध कराना केन्द्र और राज्य सरकार की महति जिम्मेदारी है। वर्तमान में सरकारें इस जिम्मेदारी से बचने के लिए नए-नए रास्ते इजात कर रही है। उन्हीं में एक है पीपीपी मॉडल पर सरकारी संस्थाओं को निजी हाथों में सौंप देना। केन्द्र और राज्य सरकारों को इससे बचना चाहिए और संविधान द्वारा उन्हें जो दायित्व सौंपे गए है, उनका भलीभांति निर्वाह करना चाहिए। केन्द्र और राज्य सरकारों को जनहित का मुद्दा सबसे ऊपर रखना चाहिए। इससे बचने को कोई कुप्रयास नहीं करना चाहिए।
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