सुमरण करने वाले का ही सु-मरण होगा: आर्यिका भावनामति माताजी
इटारसी। जीवन में सुमरण और भजन जरूरी है। ‘सुमरण’ शब्द स्वयं कह रहा है—‘सु-मरण’। जो सुमरण करेगा, उसका ही सु-मरण होगा। जो जन भजन करता है, वही सज्जन और महाजन है, अन्यथा उसे दुर्जन ही समझना चाहिए।
यह उद्गार इटारसी में चातुर्मास कर रहीं आर्यिका संघ प्रमुख परम पूज्य आर्यिका श्री 105 भावनामति माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। इस अवसर पर आर्यिका भक्तिमति एवं आर्यिका सदयमती माताजी भी उपस्थित थीं।
आर्यिका भावनामति माताजी ने कहा कि भोजन करना पाप नहीं है, लेकिन भोजन करते समय भगवान को भूल जाना पाप है। जीवन का गणित बड़ा उल्टा है। वर्तमान को सुधारोगे तो भविष्य सुधरेगा और जीवन को सुधारोगे तो मरण अपने आप सुधर जाएगा।
उन्होंने कहा कि जन्म जितना सत्य है, मृत्यु भी उतनी ही सुनिश्चित है। मृत्यु जीवन के कालीन पर पैर रखकर ही आती है। नवजात शिशु की पहली किलकारी में ही मृत्यु की अंतिम घोषणा छिपी होती है। जब जन्म मंगल, शुभ और उत्सव है तो मृत्यु मातम, अशुभ और अमंगल कैसे हो सकती है? हमारी सोच ने ही मृत्यु को मातम और अमंगल मान लिया है, जबकि आध्यात्मिक दृष्टि से ऐसा नहीं है।
माताजी ने भगवान महावीर के उपदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘जम्मं दुक्खं’ अर्थात जन्म भी दुःख है। दुनिया भले ही जन्म को उत्सव मानती हो, लेकिन अध्यात्म की दृष्टि से जन्म भी एक दुःख है। जरा अर्थात बुढ़ापा भी दुःख है और मरण भी दुःख है।
उन्होंने कहा कि अध्यात्म की इस भाषा को समझकर जीवन जीने की आवश्यकता है। यदि इसे नहीं समझा तो मनुष्य संसार के बंधनों में और अधिक जकड़ता चला जाएगा। माया उसे अपने मोह में बांध लेगी। इसलिए केवल मृत्यु को ही समस्या मानना उचित नहीं है; जन्म भी एक समस्या है। जीवन को सुधारना ही मरण को सुधारने का सबसे सरल मार्ग है।
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