- देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल
हमारी सनातन संस्कृति में प्रत्येक कार्य के शुभारम्भ में भगवान श्रीगणेश की प्रथम पूजा की जाती है। वे सभी देवी-देवताओं के भी परमाराध्य है । गोस्वामी तुलसीदासजी भी श्रीरामचरितमानस के शुभारंभ में श्री गणेशजी की वंदना करते हुए कहते हैं :-
जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन,
करउँ
अनुग्रह सोइ बुद्धियसि सुभ गुन सदन ।
अर्थात् जिनका स्मरण करने से ही सब कार्य सिद्ध होते हैं, जो गणों के स्वामी और सुन्दर हाथी के मुख वाले हैं वे ही बुद्धि के राशि और शुभगुणों के धाम श्रीगणेश कृपा करें । इन्हीं प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश के संदर्भ में आख्यान आता है कि एक बार देवी-देवताओं के समक्ष यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि सर्वप्रथम पूजन किसका किया जाय अतः समाधान हेतु सभी देवी देवता भगवान शिव के पास गये और निर्णय करने की प्रार्थना की, तब भगवान शिव ने कहा कि जो सबसे पहिले पृथ्वी की परिक्रमा पूर्ण करके आयेगा, वही प्रथम पूजनीय होगा । यह सुनकर सभी देवतागण पृथ्वी की परिक्रमा हेतु निकल पड़े।किन्तु श्रीगणेश ने शास्त्र मतानुसार पृथ्वी की परिक्रमा करने के बदले अपने पिता भगवान शिव को आकाश और माँ पार्वती को पृथ्वी मानकर श्रद्धा पूर्वक उनकी ही परिक्रमा कर ली । वही अन्य देवता जिनमें श्री गणेश के अग्रज श्री कार्तिकेय भी थे पृथ्वी की परिक्रमा करने के बाद भगवान शिव के पास आये तो देखा कि श्रीगणेश वहाँ पहिले से ही उपस्थित थे । तब भगवान शिव ने श्रीगणेश के द्वारा माता-पिता की परिक्रमा कर लेनी की बात सभी को बताई और कहा कि श्री गणेश ने अपने विवेक से संसार को जो अपने धर्माचरण द्वारा संदेश दिया है उसके कारण ही वे अग्रपूजा के अधिकारी मान लिये गये हैं। भगवान शिव के निर्णय से सभी देवता सहमत हुए और श्री गणेश के आचरण को भी शास्त्र सम्मत माना । जैसा कि वर्णन आया है कि:-
पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति यः।
तस्य
वै पृथ्वीजन्यफलम् भवति निश्चितम् ।
अर्थात् जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है उसे पृथ्वी परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाते हैं । इस दृष्टि से श्रीगणेश ने परिक्रमा का आध्यात्मिक अर्थ भी संसार के समक्ष रखा कि माता पिता की परिक्रमा करना केवल मात्र चक्कर लगाना नहीं है । परिक्रमा का आध्यात्मिक अर्थ है, अन्तकरणः से श्रद्धा विश्वास सहित अपने श्रद्धेय से सतत् जुड़े रहना । इसी संदर्भ में माँ नर्मदा के परिक्रमा का विधान का वर्णन श्री नर्मदापुराण में आया है। परिक्रमावासी नर्मदा की परिक्रमा किया करते हैं। नर्मदाजी में भी निमग्न हर कंकर को शंकर मानकर पूजा की जाती है । श्रीगणेश द्वारा की गई अपने माता-पिता की परिक्रमा और माँ नर्मदा की परिक्रमा में यह अद्भुत समानता है कि दोनों में अन्तःकरण में स्थित श्रद्धा ही श्रद्धेय से दूर नहीं जाने देती है । शास्त्र कहते हैं कि यही श्रद्धा हमें विश्वास से जोड़कर देवत्व की ओर ले जाती है पर जिनकी अपने माता-पिता के प्रति श्रद्धा नहीं होती है वे ईश्वर के प्रति भी श्रद्धावान नहीं होते हैं। तब भले ही वे सिद्धजन क्यों न हो ऐसे श्रद्धा विश्वास विहीन व्यक्तियों के सम्बन्ध में मानस रचनाकार गोस्वामीजी तुलसी दास जी तो यहां तक कहते हैं:-
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तः स्थमीश्वरं ।
अर्थात् सिद्धजन भी इसी श्रद्धा विश्वास के अभाव में अपने अन्तःकरण में विराजमान ईश्वर को नहीं देख सकते हैं । इस अर्थ में भगवान श्री गणेश ने न केवल हम सभी को श्रद्धा-विश्वास की फलश्रुति बताई है, बल्कि वे माता पार्वती और पिता भगवान शिव दोनों की ही दृष्टि से परीक्षा में सफल हुये। इसी संदर्भ में एक दूसरा प्रसंग श्रीगणेश की मोदक प्रियता से आया है कि एक दिन माता पार्वती के हाथ में एक दिव्य मोदक को देखकर बालक श्रीगणेश और श्री कार्तिकेय जी ने उनसे मोदक को माँगा तो माता पार्वती जी ने कहा कि यह मोदक दिव्य है इसे ग्रहण करने वाला सभी शास्त्रों का ज्ञाता, विद्वान और सर्वज्ञ होगा। दूसरे इस मोदक की गंध से ही अमरत्व की प्राप्ति होती है । अतः तुम दोनों में से जो अपने धर्माचरण के माध्यम से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करेगा वहीं इस मोदक की प्राप्ति का अधिकारी होगा। ऐसा सुनकर कार्तिकेय जी सम्पूर्ण तीर्थों की यात्रा करने निकल गये। पर श्री गणेश जी ने धर्माचरण का अर्थ माता-पिता की भक्ति से लिया और उनकी ही परिक्रमा करके माता पार्वती के समक्ष पहुँचकर प्रणाम किया। वहीं कार्तिकेय जी ने सम्पूर्ण तीथर्थों में स्नान-दान कर वापिस लौटकर आये और माता पार्वती से कहा कि मुझे मोदक दीजिए, तो पार्वतीजी ने कहा, कि पुत्र कार्तिकेय, सम्पूर्ण तीथर्थों में स्नान, दान, पुण्य सब यज्ञों का अनुष्ठान में सभी साधन माता-पिता के पूजन के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं हो सकते हैं। श्रीगणेश ने तो हमारी ही परिक्रमा करके यह फल पा लिया है । इसमें भगवान शिवजी की सम्मति भी है। अतः यह मोदक मैं श्री गणेश को ही देती हूँ। यह सुनकर सभी भगवान श्रीगणेश जी के शास्त्र-सम्मत आचरण की सराहना की। शास्त्रों में भी पुत्र के कर्तव्यों के सम्बन्ध में स्पष्ट लिखा है:-
अपहाय गृहे यो वै पितरौ तीर्थमाव्रजेत ।
तस्य
पापं तथा प्रोक्तं हनने च तयोर्यथा।।
पुत्रस्य
च महत्तीर्थ पित्रोश्चरणपकंजम् ।
अन्य
तीर्थ तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः ।।
इदं
सनिहितं तीर्थ सुलभं धर्मसाधनम्।
पुत्रस्य
च स्त्रियाश्चैव तीर्थ गेहे सुशोभनम् ।
अर्थात् जो माता-पिता को घर पर छोड़कर तीर्थ यात्रा के लिए जाता है वह धर्माचरण नहीं है। क्योंकि पुत्र के लिए माता-पिता के चरण सरोज ही महान तीर्थ होते हैं । अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते हैं परन्तु धर्म का साधनभूत यह तीर्थ तो पास में ही है। यही कारण है कि मानस के रचनाकार श्री तुलसीदास जी द्वारा विनय पत्रिका में श्री गणेश स्तवन में जो उन्हें मोदक प्रिय कहकर वन्दना की है उसमें भी श्रीगणेश की मातृ-पितृ भक्ति और उनकी प्रसन्नता की अभिव्यक्ति ही मोदक का प्रतीक बन गई है। वर्णन आया है :-
मोदक प्रिय मुद मंगल दाता, बिद्या बारधि बुद्धिविधाता
अर्थात् श्री गणेश को मोदक प्रिय है वे विद्या के सागर और बुद्धि के दाता है पर इस मोदक का शाब्दिक अर्थ जहाँ यह लडड्डू या मिठाई है वही तुलसीदास जी की वन्दना में आये अर्थानुसार माता-पिता को पुत्र के आचरण से जो प्रसन्नता होती है वही पुरुषार्थ चतुष्ट्य की प्राप्ति में सहायक होती है । यह रहस्योद्घाटन स्वयं भगवान श्रीराम ने अपने पिताश्री से वन जाते समय किया है:-
धन्य जनमु जगतीतल तासु, पितहि
प्रमोदु चरित सुनि जासु ।
चारि
पदास्थ कर तल जाकें, प्रियपितु मातु प्रातु सम जाकें।
अर्थात् उस पुत्र का जन्म धन्य है जिसके चरित्र सुनकर पिता को आनंद हो। जिस पुत्र को माता-पिता प्राणों के समान प्रिय हैं उसे चारों पदार्थ तो मुठठी में रहते हैं । मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम एक पुत्र के रूप में अपने माता पिता को प्रतिदिन प्रातः प्रणाम करते हैं । वर्णन आया है :-
प्रातःकाल उठि के रघुनाथा, मातुपिता
गुरू नावहिं माथा ।
आयसु
मागि करहिं पुर काजा, देखि चरित हरषइ मन राजा।
अर्थात् श्री रघुनाथजी प्रातःकाल उठकर माता-पिता और गुरु को मस्तक नवाते हैं और उनकी आज्ञा लेकर नगर का काम करते है। वहीं इसके विपरीत आचरण वाली संतति के सम्बन्ध में तुलसी दासजी ने बालकाण्ड में लिखा है :-
मानहिं मातु-पिता नहिं देवा साधुन्ह सन करवावहिं सेवा ।
जिन्ह
के यह आचरन भवानी ते जानहू निसिचर सब प्रानी ।
अर्थात् जो अपने माता-पिता और देवताओं को नहीं मानते और साधुओं से सेवा करवाते हैं । हे भवानी ! जिनके ऐसे आचरण है उन सबको राक्षस ही समझना चाहिये। तब विचारणीय है कि वर्तमान में दिनोंदिन बढ़ते वृद्धाश्रमों की संख्या से लगता है कि हमने श्रीगणेश पूजन का सही अर्थ नहीं समझा है। यह सब होते देखकर क्या भगवान श्रीगणेश हम पर प्रसन्न होंगे? जबकि हमारे शास्त्र कहते है कि -
मातापितृवचः कार्य सत्पुत्रेण यशस्विना,
पूजनं
च तयोः कार्य पोषणं पालनं तथा।
अर्थात् माता पिता के वचनों का पालन उनका पूजन करना यशस्वी सत्पुत्र का परम कर्तव्य है
