लघु कथा :
छुट्टियाँ हमारी, कीमत प्रकृति की
“मम्मी, यहाँ इतना कचरा किसने फैलाया?” पहाड़ी रास्ते पर चलते हुए आरव ने पूछा।
माँ ने आसपास बिखरी बोतलों और पैकेटों को देखा। “शायद हम जैसे घूमने आए लोगों ने।”
“हम जैसे?”
“हाँ बेटा। हम सब कहते हैं—मेरे एक पैकेट से क्या होगा।”
कुछ दूर जाम में फँसी गाड़ियों से धुआँ उठ रहा था। आरव फिर बोला, “फिर लोग यहाँ आते ही क्यों हैं?”
माँ मुस्कुराईं, “क्योंकि जगह सुंदर है।”
“तो सुंदर जगह को गंदा करना कैसी पसंद?”
माँ चुप हो गईं।
वापसी में आरव ने अपना खाली चिप्स का पैकेट बैग में रख लिया।
माँ ने पूछा, “डस्टबिन नहीं मिला?”
“नहीं।”
“फिर?”
आरव ने पहाड़ों की ओर देखकर कहा-
“हम यहाँ मेहमान हैं न? मेहमान जाते समय मेज़बान का घर गंदा छोड़कर थोड़े जाते हैं।”
माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
रास्ता वही था, पर सवाल अब उनके साथ घर तक जाने वाला था।
- डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
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कथा कहानी
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