वस्तुएं बाहर बढ़ती हैं, लेकिन लोभ भीतर नहीं बढ़ना चाहिए : आर्यिका भावनामति
महावीर भवन में आर्यिका भावनामति के प्रवचन
इटारसी। जैन आर्यिका श्री भावनामति माताजी ने महावीर भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि हम अक्सर कहते हैं कि मेरे पास यह नहीं है, मेरे पास वह नहीं है। लेकिन कभी यह भी सोचना चाहिए कि मेरे पास जो कुछ है, क्या मैं उसके लिए धन्यवाद करता हूं? जिस दिन व्यक्ति “और चाहिए” की भावना से निकलकर “जो मिला है, उसमें संतोष” की ओर आता है, उसी दिन जीवन में उत्तम शौच धर्म का प्रवेश होता है।
उन्होंने कहा कि शुचिता का अर्थ यह नहीं है कि जीवन में धन या वस्तुएं बिल्कुल न हों। भाव यह है कि वस्तुएं हमारे पास रहें, लेकिन हमारा मन वस्तुओं में न फंसे। हम धन के मालिक रहें, धन हमारा मालिक न बन जाए।
आर्यिका माताजी ने कहा कि जब आप अपने घर जाएं तो अपने मन से पूछें कि हमें सबसे अधिक चिंता किस बात की रहती है—धन की, वस्तुओं की, सम्मान की या अपनी आत्मा की? जिस चीज की चिंता हमें सबसे अधिक रहती है, उसी के प्रति हमारा मोह भी सबसे अधिक होता है। हमें अपने भीतर झांकना चाहिए और संकल्प लेना चाहिए कि अनावश्यक इच्छाओं को कम करेंगे, दूसरों की वस्तु देखकर लोभ नहीं करेंगे, जो प्राप्त है उसमें संतोष रखेंगे और अपनी आत्मा को चिंतन में लगाएंगे।
उन्होंने कहा कि धन से मन कभी पूरी तरह नहीं भरता और वस्तुओं से इच्छाओं का अंत नहीं होता। जीवन में शांति संतोष से आती है। संतोष की एक बूंद भी जीवन को शांति प्रदान कर सकती है।
मन की सफाई भी जरूरी
आर्यिका भावनामति ने कहा कि पवित्रता बिना निर्मलता के नहीं आती। शौच का सामान्य अर्थ हम साफ-सफाई से लेते हैं, लेकिन हमें यह भी विचार करना चाहिए कि क्या हमने कभी अपने मन की सफाई की है? लोभ, अधिक से अधिक संग्रह की इच्छा, दूसरों की वस्तु देखकर उसे पाने की लालसा और जो मिला है उससे असंतोष—ये सभी मन को अशुद्ध करते हैं। धर्म हमें इन्हीं भावों से मन को साफ करना सिखाता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मान लीजिए किसी व्यक्ति के पास एक घर है। वह कहता है कि मुझे दूसरा घर चाहिए। दूसरा घर मिलने के बाद तीसरे घर की इच्छा पैदा हो जाती है। इसी तरह धन और वस्तुएं बढ़ती जाती हैं, लेकिन यदि मन का संतोष नहीं बढ़ता तो इच्छाओं का अंत नहीं होता।
उन्होंने कहा कि प्रश्न यह नहीं है कि हमारे पास कितना है, बल्कि यह है कि हमारे मन की चाह कितनी है। वस्तुएं बाहर बढ़ती हैं, लेकिन लोभ भीतर नहीं बढ़ना चाहिए। यह धर्म हमें बाहर के संग्रह को बढ़ाने के बजाय भीतर के लोभ को कम करने की प्रेरणा देता है।
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