ad

लघु कथा :जवाब आपका परिचय है - डॉ. रीटा अरोड़ा ,करनाल


लघु कथा :

जवाब आपका परिचय है

“मम्मी, आपने उसे जवाब क्यों नहीं दिया? उसने सबके सामने आपसे कितनी बदतमीज़ी से बात की।”

निधि ने घर आते ही माँ से पूछा।

माँ मुस्कुराईं- “जवाब तो दिया था बेटा।”

“वो भी कोई जवाब था? इतनी शांति से बात कर रही थीं आप। मुझे होता तो वहीं सुना देती।”

माँ ने पानी का गिलास मेज़ पर रखते हुए कहा- “यही तो फर्क है बेटा… सामने वाला क्या बोलता है, यह उसका संस्कार बताता है। हम क्या जवाब देते हैं, यह हमारा।”

निधि कुछ देर चुप रही।

फिर बोली- “लेकिन अगर हम चुप रहें या प्यार से जवाब दें, तो सामने वाला समझता है कि हम कमजोर हैं।”

माँ हँस पड़ीं- “आवाज़ ऊँची करना ताकत नहीं होती निधि। कई बार शांत रहने के लिए ज्यादा ताकत चाहिए।”

“पर अपनी बात मनवाना भी तो जरूरी है।”

“अपनी बात कहना जरूरी है… हर हाल में मनवाना नहीं।”

निधि माँ को देखने लगी।

माँ बोलीं- “हम बोलना बहुत छोटी उम्र में सीख जाते हैं, लेकिन कब, कहाँ और कितना बोलना है… यह सीखते-सीखते पूरी उम्र निकल जाती है।”

“फिर गुस्सा आए तो?”

“गुस्सा आए, तो जवाब देने से पहले बस इतना सोच लेना कि मैं बात सुलझाना चाहती हूँ या केवल आखिरी शब्द मेरा हो।”

निधि मुस्कुरा दी- “मतलब हर बहस जीतना जरूरी नहीं?”

“बिल्कुल नहीं। कई बार रिश्ते बचा लेना, बहस जीतने से ज्यादा जरूरी होता है।”

कुछ पल बाद निधि ने पूछा- “और अगर सामने वाला फिर भी बदतमीज़ी करे?”

माँ ने धीरे से कहा-

“सवाल जितनी भी बदतमीज़ी से पूछा जाए, जवाब सलीके से देना… क्योंकि लोग सवाल से ज्यादा आपका जवाब याद रखते हैं।”

निधि ने सिर हिलाया।

“शायद सही कहा आपने… भाषा तो प्यार जताने, अपनी बात समझाने और ज्ञान बाँटने का जरिया है। उसे हथियार क्यों बनाना?”

माँ मुस्कुराईं-

“बस यही बात समझ आ जाए, तो आधे झगड़े अपने आप खत्म हो जाएँ।”

निधि ने माँ का हाथ पकड़ लिया और बोली-

“आज समझ आया… बोलना कला है, लेकिन सलीके से बोलना संस्कार।”

-  डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post