लघुकथा :
पुन: परिक्षा
सुबह की दिनचर्या अभी समाप्त कर वह अभी डे प्लान ही कर रहा था कि फ़ोन की घंटी बजी-"डॉ सक्सेना से बात हो सकती है?”
"जी,बोल रहा हूं।"
"सर! मैं दिनेश, पॉलीक्लीनिक में अपके साथ था, फार्मासिस्ट था।"
कहो कैसे हो? सुबह सुबह?सब ठीक है ना?
"नही सर सब गड़बड़ है, आपकी मदद चाहिए।"
"अरे ऐसी भी क्या बात है, बोलो ना।"
"सर मेरी बेटी को बेटा हुआ है।"
मुबारक हो। इसमें परेशानी क्या है?कुछ बिल विल की समस्या है?''
नहीं सर, अभी प्रिग्नेंनसी का सातवां महिनै ही चल रहा था आधा हुआ था। उसका बीपी हाई रहने लगा धबराहट चक्कर आने लगे। उस दिन कुछ झटके से आये, स्थानीय डाक्टर को दिखाया,तीन दिन बाद बोला-"यहां नहीं हो सकेगा,किसी बड़े अस्पताल में ले जाओ।"
"फ़िर?"
"सर, फिर आपके अस्पताल मे ले आये जीजा लोग।"
"ये तो अच्छा किया,अब समस्या क्या है?"
सर! ऑपरेशन के समय बीपी बहुत बढ गया था । उसके बाद से बेहोश है। नब्ज़ नाड़ी किडनी लिवर सब ठीक-ठाक हैं पर ऑखें पथरा गई है। वेंटीलेटर पर है। सभी बड़े से बड़े को बुलाया,सबका कहना है "ब्रेन डेड "। अब आप ही से उम्मीद है,एक बार आकर देख कर बतायें।"
"आता हू।"
"डा राजेश बिना समय गॅवाये तैयार हुएं और दौड़ पड़े।"
अस्पताल आ सीधे उसी वार्ड बेड पर गये। पेपर्स देखे मरीज़ की जांच की। हालत बहुत से बहुत ख़राब थी।
डॉ राजेश के दिल दिमाग़ पर पॉच जनवरी चौबीस हावी हो गई। उनकी बेटी की जान दॉव पर थी। संघर्ष जारी था। मुंबई शहर का नं वन इटेंसिविस्ट डाक्टर उन्हें दोनों कंधों पर हाथ रख जीवन का फ़लसफ़ा समझा, और फिर "सॉरी सर"कह कर चला गया।
आज डाक्टर राजेश फिर उसी मुहाने, ज़िन्दगी के दो राहे पर थे। ज़िन्दगी में मौत के मुहाने पर दर्जनों लोगों को उनने "सॉरी" कहा था और पलट कर भी न देखा। उस दिन जब डॉ कोठारी ने उन्हें "सॉरी"कहा, दिल दहल गया था।
आज फिर डॉ राजेश उसी मुहाने पर खड़े थे कलेजा मुंह मे था। सबकी निगाहें उन पर टिकी थीं।ज़ुबान को शब्द नहीं मिल रहे थे। पुनः परिक्षा की घड़ी थी।
--कर्नल डा गिरिजेश सक्सेना , भोपाल
Tags:
कथा कहानी
