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आदमी घर में बैठा है, सरकारी कागज उसे ढूंढ रहा है - प्रो. आरके जैन “अरिजीत”शिक्षाविद् ,बड़वानी



आदमी घर में बैठा है, सरकारी कागज उसे ढूंढ रहा है

[पहले वोटर थे, अब गवाही देनी है कि वोटर हैं]

[मतदाता सूची की सफाई: कहीं आईना ही तो नहीं पोंछा जा रहा?]

   उत्तराखंड में मतदाता सूची की सफाई शुरू हुई तो लगा, जैसे लोकतंत्र के पुराने घर में झाड़ू चल रही हो। धूल हटनी ही चाहिए, लेकिन झाड़ू लगते-लगाते एक चौंकाने वाला सच सामने आया—उधम सिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून और नैनीताल, इन चार मैदानी जिलों से ही नाम हटाने के करीब 80-85 प्रतिशत आवेदन आए हैं। पहाड़ खामोश हैं, मैदानों में हलचल है। सवाल सूची की सफाई पर नहीं, इस असमानता पर है—आखिर इतनी ‘गंदगी’ इन्हीं चार जिलों में क्यों मिली? लोकतंत्र में आंकड़े मौन जरूर होते हैं, मगर कभी-कभी उनका मौन ही सबसे तीखा सवाल बन जाता है।
मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित, दोहरी या गलत प्रविष्टियां हों तो उन्हें हटाना व्यवस्था की जिम्मेदारी है। मगर सफाई और छंटाई में फर्क है—घर की धूल हटाई जाती है, घर के लोग नहीं। उत्तराखंड के पहाड़ों से मैदानों की ओर वर्षों से पलायन हुआ। लोग यहां बसे, घर बनाए, बच्चों को पढ़ाया, दुकानें खोलीं, मजदूरी और नौकरियां कीं और इसी मिट्टी में अपने जीवन की जड़ें जमा दीं। कई वर्षों से वोट देते आए ये लोग अब अचानक संदेह के घेरे में हों तो मामला कागज से आगे बढ़ जाता है। तब आदमी को अपने ही घर में यह साबित करना पड़ता है कि वह सचमुच इसी घर का है।
फॉर्म-7 इस कहानी का छोटा-सा कागज है, लेकिन उसके पीछे बड़ा सवाल है—आवेदन कौन कर रहा है और किस आधार पर? कोई इसे घुसपैठ से जोड़ रहा है, कोई दोहरी प्रविष्टि से। राजनीतिक दल अपने-अपने चश्मे से तस्वीर देख रहे हैं और प्रशासन नियम-कायदों के बीच रास्ता तलाश रहा है। मगर इन सबके बीच आम मतदाता अकेला खड़ा है—न उसके पास माइक है, न मंच, न अपनी बात कहने का कोई प्रभावशाली सहारा। उसके पास बस उसका नाम है। डर यही है कि अगली सूची में कहीं वही नाम न हो। जिस बुजुर्ग ने वर्षों मतदान किया, उसका नाम एक दिन गायब मिले तो यह महज कंप्यूटर की गलती नहीं, लोकतंत्र के दरवाजे पर उसके लिए बंद हुआ एक किवाड़ है।
चार जिलों में ही इतने आवेदन क्यों आए—इस सवाल का जवाब जरूरी है। मैदानों में आबादी अधिक है, प्रवासी, मजदूर, व्यापारी और अलग-अलग जगहों से आकर बसे परिवार भी अधिक हैं; इसलिए सूची में बदलाव की संभावना स्वाभाविक है। लेकिन सवाल फिर भी बचता है—पहाड़ों में नाम कम हट रहे हैं तो क्या वहां सब कुछ अपने आप सही है? क्या कम आवेदन शुद्धता की गारंटी हैं? या मैदानों की भीड़ को ही संदेह की पहली सीढ़ी मान लिया गया है? पहाड़ का सन्नाटा शुद्धता और मैदान की भीड़ गड़बड़ी मान लेना आसान है। मगर लोकतंत्र सुविधा से नहीं, सबके लिए एक जैसी कसौटी से चलता है।
सत्ता को सफाई हमेशा पसंद आती है—सड़कें साफ हों, दफ्तर साफ हों, फाइलें साफ हों और मतदाता सूची भी साफ हो, इससे भला किसे आपत्ति होगी? मुश्किल तब शुरू होती है, जब सफाई के नाम पर यह तय होने लगे कि कौन ‘अनावश्यक’ है। गलत नाम हटाना जरूरी है, लेकिन सही नागरिक को महज संदेह के आधार पर सूची से बाहर करना लोकतंत्र के साथ बड़ी भूल होगी। कागजों की दुनिया में इंसान धीरे-धीरे सिर्फ एक ‘एंट्री’ बन जाता है; एंट्री गलत हुई तो आदमी भी गलत ठहर जाता है। फिर सवाल यह नहीं रहता कि तुम कौन हो, सवाल बन जाता है—साबित करो कि तुम वही हो, जो कल तक थे।
सबसे चिंता की बात नाम हटने की संख्या नहीं, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता है। जब इतने बड़े पैमाने पर आवेदन आए हैं तो उनकी जांच भी उतनी ही गंभीर, निष्पक्ष और स्पष्ट होनी चाहिए। कौन आवेदन कर रहा है, किस आधार पर और सत्यापन किस तरह हो रहा है—इन सवालों का जवाब व्यवस्था को देना ही होगा। आवेदन पड़ोसी ने किया, प्रतिद्वंद्वी ने या किसी संगठित तंत्र ने—अनुमान से ज्यादा जरूरी निष्पक्ष जांच है। लोकतंत्र में नाम जोड़ना कृपा नहीं और नाम हटाना सजा नहीं। हर आवेदन को सच मान लेना जितना खतरनाक है, हर शिकायत को राजनीतिक साजिश मान लेना भी उतना ही गलत।
मतदाता सूची कोई साधारण सरकारी रजिस्टर नहीं, वह समाज की नागरिक स्मृति है। उसमें दर्ज हर नाम इस बात की गवाही है कि एक इंसान की आवाज लोकतंत्र तक पहुंचती है। मजदूर हो या व्यापारी, प्रवासी परिवार हो या बूढ़ा नागरिक—हर नाम के पीछे एक जीवन, एक संघर्ष और एक उम्मीद है। नाम मिटाना कुछ सेकंड का काम हो सकता है, लेकिन उससे जन्मा अविश्वास वर्षों तक पीछा करता है। लोकतंत्र की स्याही कागज पर सूख जाती है, मगर भरोसे पर पड़ी खरोंच आसानी से नहीं मिटती। इसलिए सफाई ऐसी हो जिसमें गलतियां हटें, नागरिक नहीं; दोहरी प्रविष्टियां मिटें, किसी का अधिकार नहीं।
उत्तराखंड की यह पहेली किसी दल, समुदाय या जिले भर की समस्या नहीं, पूरी व्यवस्था की परीक्षा है। चार मैदानी जिलों से 80-85 प्रतिशत नाम हटाने के आवेदन आए हैं तो यह आंकड़ा जांच मांगता है, फैसला नहीं। पहाड़ों की शांति को भी पूर्ण शुद्धता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। हर नाम पर समान नियम, हर शिकायत पर समान जांच और हर नागरिक को समान अधिकार—यही लोकतंत्र की असली कसौटी है। चुनाव केवल मशीन, बूथ और मतपत्र नहीं, उस भरोसे का नाम है जिसमें नागरिक को यकीन होता है कि उसकी आवाज गिनी जाएगी। इसलिए आखिरी सवाल यही है—हम मतदाता सूची साफ कर रहे हैं या लोकतंत्र का आईना? आईना साफ होना चाहिए, मगर उसे पोंछते-पोंछते उसमें दिखने वाले चेहरे ही मिट जाएं, तो उस साफ आईने का अर्थ ही क्या रह जाएगा?

 - प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
शिक्षाविद् ,
बड़वानी (मप्र)
ईमेल: rtirkjain@gmail.com
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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