लघुकथा :
सवाल
“तुम्हें दुख नहीं होता? तुम्हारे पति इतनी जल्दी छोटी उम्र में तुम्हें छोड़ गए।”
सवाल सीधा था,
वह हँसी—
“होता है…”
“फिर ये पोस्ट? ये तस्वीरें?”
“क्योंकि…
अगर मैं सिर्फ दुख दिखाऊँ,
तो आप लोग कहेंगे—‘इसका तो रोज का यह रोना......ड्रामा कर रही है। ’
और अगर मुस्कुरा दूँ,
तो कहते हो—‘इसे तो दुख ही नहीं है’…”
वह चुप हुई, थोड़ा रुकी और फिर बोली,
“तो मैंने सोचा…
समाज को समझाना ही छोड़ दूँ।”
- डॉ अंजना गर्ग (सेवानिवृत )
म द वि रोहतक
Tags:
कथा कहानी
