सच्ची प्रगति तब, जब तकनीक तोड़े जातिगत दीवारें
[तकनीक की उड़ान, मगर समाज की बेड़ियाँ कायम]
डिजिटल इंडिया का सपना भारत को एक नई पहचान दे रहा है। स्मार्ट सिटी, स्टार्टअप इंडिया, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की चकाचौंध में देश की तस्वीर चमकती दिखाई देती है। यह दावा किया जाता है कि इंटरनेट ने हर वर्ग, हर समुदाय को समान अवसरों का मंच दे दिया है। लेकिन इस चमकती सतह के नीचे एक कड़वी सच्चाई छिपी है—जातिगत असमानता की जड़ें आज भी उतनी ही गहरी हैं, जितनी सदियों पहले थीं। तकनीक ने हमें वैश्विक मंच पर लाकर खड़ा किया, लेकिन सामाजिक दीवारें, जो जाति के नाम पर खड़ी हैं, आज भी अडिग हैं। डिजिटल क्रांति ने अवसरों का वादा तो किया, लेकिन यह वादा हाशिये पर मौजूद समुदायों तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाया। यह एक विडंबना है कि जिस तकनीक को समानता का हथियार माना गया, वही कई बार असमानता की खाई को और चौड़ा कर देती है।
जाति भारत में केवल एक सामाजिक पहचान नहीं है; यह अवसरों, शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक सम्मान का आधार रही है। गाँवों की गलियों से लेकर शहरों के कॉरपोरेट दफ्तरों तक, जातिगत भेदभाव हर जगह अपनी छाप छोड़ता है। डिजिटल इंडिया के दौर में उम्मीद थी कि इंटरनेट और तकनीक इस विभाजन को कम करेंगे। लेकिन वास्तविकता इससे उलट है। सोशल मीडिया पर जातिगत टिप्पणियाँ, ऑनलाइन शिक्षा में असमान पहुँच, और डिजिटल अर्थव्यवस्था में अवसरों की कमी ने दिखाया कि तकनीक अपने आप सामाजिक समानता नहीं ला सकती। अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों के बीच डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट की पहुँच अभी भी सीमित है। इसका कारण केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और संरचनात्मक भी है।
ग्रामीण भारत में इंटरनेट की उपलब्धता बढ़ी है, लेकिन इसका लाभ असमान रूप से बँटा है। जहाँ उच्च जाति के परिवारों के पास स्मार्टफोन, डेटा पैक, और डिजिटल उपकरणों की सुविधा है, वहीं दलित और आदिवासी समुदायों के लिए यह अभी भी एक दूर का सपना है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 25% दलित परिवारों के पास स्मार्टफोन है, जबकि उच्च जाति के परिवारों में यह आँकड़ा 60% से अधिक है। इस डिजिटल डिवाइड का सबसे बड़ा असर शिक्षा पर पड़ा है। कोविड-19 महामारी के दौरान जब स्कूल बंद हुए और शिक्षा ऑनलाइन हुई, तब लाखों दलित और पिछड़े वर्ग के बच्चे शिक्षा से वंचित रह गए। उनके पास न तो स्मार्टफोन थे, न ही इंटरनेट, और न ही ऑनलाइन कक्षाओं को समझने की बुनियादी सुविधाएँ। यह असमानता केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना की देन है, जो जाति के आधार पर अवसरों को सीमित करती है।
सरकारी योजनाएँ, जो डिजिटल इंडिया के माध्यम से लागू की जा रही हैं, भी इस असमानता से अछूती नहीं हैं। आधार कार्ड और डिजिटल बैंकिंग को अनिवार्य करने का दावा है कि इससे योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थी तक पहुँचेगा। लेकिन हकीकत में, कई दलित और आदिवासी परिवारों के पास न तो आधार कार्ड है, न ही बैंक खाते, और न ही डिजिटल लेन-देन की समझ। नतीजा यह है कि वे सरकारी योजनाओं से वंचित रह जाते हैं। उदाहरण के लिए, कई ग्रामीण क्षेत्रों में दलित समुदायों को डिजिटल राशन कार्ड या ऑनलाइन सब्सिडी के लिए जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जिनमें उनकी पहुँच और शिक्षा की कमी आड़े आती है। यहाँ जाति और आर्थिक स्थिति मिलकर एक ऐसी दीवार खड़ी करती है, जो डिजिटल इंडिया के सपने को अधूरा छोड़ देती है।
डिजिटल नौकरी बाज़ार में भी यही असमानता दिखती है। तकनीकी कौशल, अंग्रेजी भाषा का ज्ञान, और नेटवर्किंग की कमी के कारण हाशिये के समुदाय डिजिटल अर्थव्यवस्था में पीछे रह जाते हैं। शहरों में उच्चवर्गीय परिवार अपने बच्चों को कोडिंग, डेटा साइंस, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे कौशलों की ट्रेनिंग दे रहे हैं, जबकि ग्रामीण और दलित परिवारों के बच्चे बुनियादी डिजिटल साक्षरता से भी वंचित हैं। एक अध्ययन के अनुसार, भारत की टेक इंडस्ट्री में केवल 10% कर्मचारी अनुसूचित जाति या जनजाति से आते हैं, जबकि उनकी आबादी देश की कुल आबादी का लगभग 25% है। यह असमानता न केवल आर्थिक है, बल्कि सामाजिक संरचनाओं का भी परिणाम है, जो अवसरों को कुछ वर्गों तक सीमित रखती हैं।
ऑनलाइन दुनिया में भी जातिगत पूर्वाग्रह खत्म नहीं हुए हैं। मैट्रिमोनियल साइट्स और डेटिंग ऐप्स पर जाति की पूछताछ आम बात है। नौकरी के लिए ऑनलाइन प्रोफाइल देखकर उम्मीदवार की जाति का अनुमान लगाया जाता है। सोशल मीडिया पर दलित और पिछड़े वर्ग के युवाओं को उनकी उपलब्धियों के बावजूद “कोटा” जैसे शब्दों से अपमानित किया जाता है। यह दिखाता है कि तकनीक ने भले ही संचार के नए रास्ते खोले हों, लेकिन सामाजिक सोच को बदलने में वह नाकाम रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी वही पुरानी सत्ता संरचनाएँ हावी हैं, जो समाज में पहले से मौजूद थीं।
इसके बावजूद, डिजिटल इंडिया ने हाशिये की आवाज़ों को एक मंच जरूर दिया है। दलित यूट्यूबर्स, बहुजन ब्लॉगर्स, और आदिवासी लेखक अपनी कहानियाँ और विचार दुनिया तक पहुँचा रहे हैं। सोशल मीडिया ने उन्हें वह आवाज़ दी है, जो पहले मुख्यधारा के मीडिया में दबा दी जाती थी। लेकिन यह बदलाव व्यक्तिगत स्तर पर है। व्यापक स्तर पर, जातिगत असमानता की दीवारें अभी भी मजबूत हैं। जब दलित या आदिवासी एक्टिविस्ट अपनी बात रखते हैं, तो उन्हें ऑनलाइन ट्रोलिंग, गालियों, और धमकियों का सामना करना पड़ता है। कई बार उनके अकाउंट तक बंद करा दिए जाते हैं। यह दिखाता है कि डिजिटल दुनिया में भी सत्ता और विशेषाधिकार की संरचनाएँ बरकरार हैं।
इस असमानता का समाधान केवल तकनीकी विस्तार में नहीं है। इसके लिए सामाजिक सुधार, नीति निर्माण, और जागरूकता की जरूरत है। सबसे पहले, डिजिटल साक्षरता को हाशिये के समुदायों तक ले जाना होगा। स्कूलों में मुफ्त इंटरनेट, सस्ते डेटा प्लान, और क्षेत्रीय भाषाओं में डिजिटल कंटेंट इस दिशा में बड़ा कदम हो सकता है। साथ ही, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर जातिगत भेदभाव और घृणा फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कानून और निगरानी जरूरी है। शिक्षा और रोजगार के अवसरों को समान बनाने के लिए विशेष योजनाएँ बनानी होंगी, जो दलित और आदिवासी समुदायों को डिजिटल अर्थव्यवस्था में शामिल करें।
नए भारत की असली तस्वीर तब उभरेगी, जब डिजिटल इंडिया केवल तकनीकी प्रगति का प्रतीक न होकर सामाजिक समानता का आधार बने। जब गाँव का दलित बच्चा उसी आत्मविश्वास से ऑनलाइन शिक्षा ले और नौकरी हासिल करे, जैसा कि शहर का उच्चवर्गीय बच्चा, तभी डिजिटल इंडिया का सपना साकार होगा। तकनीक दीवारें गिराने का हथियार हो सकती है, लेकिन इसके लिए समाज को अपनी सोच की दीवारें पहले तोड़नी होंगी। जब तक यह नहीं होगा, तब तक डिजिटल इंडिया का चमकता चेहरा अधूरा ही रहेगा, और जातिगत असमानता की छाया उस पर पड़ती रहेगी।
- प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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