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लघुकथा : राजा का परिधान - सुरेश पटवा , भोपाल


 लघुकथा : 

राजा का परिधान


राजा साहिब ने सुबह बिस्तर से उठ कमख़्वाब के मुलायम गलीचे पर पैर रख सामने रखे आदमकद शीशे में ख़ुद को देखा, तो नंगे दिखे। वे चीखे – यह शीशा ठीक नहीं है उस इस पर पर धूल जमी है। 

अनुचर से शीशा साफ़ करवाया। फिर भी राजा नंगे ही दिखे। 

राजा ने अनुचर से उन्हें कपड़े पहनाने को कहा। अनुचर ने उन्हें शयन वस्त्र उतार कर राजसी वस्त्र पहना दिए। राजा फिर शीशा देख बोले – अरे, अभी भी हम नंगे दिखते हैं। अनुचर, तू कपड़ा पहने दिख रहा है। तू अपने कपड़े उतार। 

अनुचर कपड़े उतारने गया। इसी बीच दीवान साहिब जनता पर नया कर लगाने का फ़रमान दस्तख़त करवाने आए।

राजा साहिब ने पूछा – दीवान जी, जरा शीशा देख कर बताइए ठीक है ना। इस पर धूल तो नहीं जमी। 

दीवान साहिब ने शीशा साफ़ कर काइयाँ निगाह से देखा और कहा – जी शीशा बिल्कुल ठीक है।

तब तक अनुचर कपड़े उतार कर टैक्स चुसी ग़रीब जनता की तरह सकुचाते हुए खड़ा था। राजा दोनों को एक साथ शीशे में देख बोले – हाँ, अब ठीक है। हम राजसी परिधान में हैं। पर जनता नंगी क्यों दिख रही है। दीवान साहब ने अनुचर को राजा के पीछे छिपाकर फिर शीशा देखने को कहा। 

राजा ख़ुश होकर बोला – हाँ अब ठीक है। जनता मेरे पीछे है। लेकिन ये जनता बड़ा-बार शीशा क्यों देखती और दिखाती है। दीवान साहिब लाइये कौन सा नया फ़रमान ज़ारी करना है। 

दीवान साहिब – हुज़ूर, आपके दुश्मन भड़काते रहते हैं। कोई नया कर लगाने को बचा ही नहीं  है। दूध से लेकर, बेसन से लेकर, रेयान से लेकर इनके सभी पदार्थों पर मल्टीपल परोक्ष कर लगा है। कुछ नहीं बचा। बस एक छोटा सा काम है। परोक्ष कर की दर दुगुनी करना है। 

राजा साहिब – दीवान साहिब, समय की धार को समझिए। अभी रियाया में नाराजी पनप रही है। परोक्ष कर की दर कम करने का फ़रमान लाइये। 

दीवान साहिब चौंक कर देखते हुए – हुज़ूर, यह तो राजनीति नहीं हुई। इतिहास गवाह है। सरकारें तो कर सुधार हमेशा खजाना भरने को करती हैं। 

राजा साहिब – तो आपसे किसने कहा कि कर की दर कम करने से ख़ज़ाना नहीं भरेगा। ये जो आईने में हमारी छवि बिगड़ती दिख रही है। उसे सुधारना है। ख़ज़ाना तो फिर भी भरेगा। 

दीवान साहिब चौंकते हुए – कैसे हुज़ूर !

राजा साहिब – जब दर कम होगी तो कारोबार बढ़ेगा। जब लोगों को ज़्यादा ख़रीद की आदत पड़ जाएगी तो फिरसे कर की दर बढ़ा देंगे, और प्रत्यक्ष कर की तलवार भी तो है ना। 

दीवान साहिब नया फ़रमान बनाने चले गए। राजा साहिब ने शीशे में देखा, जनता ख़ुश दिख रही है और राजा साहिब का स्वर्ण जड़ित रेशमी परिधान चमक रहा है। 

@सुरेश पटवा , भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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