लघुकथा :
एक पंथ तीन काज
"अरे क्या बात है कैप्टन शर्मा ..आप और साइकिल पर"
"हाँ साथियों हूँ एक पंथ दो काज कर रहा हूँ"!
"वह कैसे?
*सेहत की सेहत और पेट्रोल की बचत*
"हाँ भाई पेट्रोल कितना महंगा हो रहा है पेट्रोल की बचत भी देश सेवा है"।
"पर कैप्टन साहब साइकिल तो आप लेडीस लेकर आए हैं क्या मैडम की साइकिल मार ली है"?
"हाँ भाई श्रीमती जी की है हम भी तो *जोरु के गुलाम* है"!
साईकिल के पेडल धीरे-धीरे मारते हुए हँसते खिलखिलाते सब लोग आगे बढ़े जा रहे थे।
"वह कैसे कैप्टन साहब"
"सासू जी का आँख का ऑपरेशन हुआ है उनके लिए 10 दिन की छुट्टी पर आया हूँ उनकी माँ हमारी भी तो माँ हुई"।
"बात तो आपकी एक दम सही है"रमेश बोल पड़ा।
"सच कह रहे हो यार तुम भी तो घर जमाई बनकर सास की सेवा कर रहे हो गाँव में"
"अगर मिलिट्री की नौकरी में रहना है तो अपने आप को चुस्त-दुरुस्त भी रखना होगा"। कैप्टन बोले!
"आप सब लोग कहांँ जा रहे हो" ?
"अरे हम पांचों पांडवों ने तो यह तय कर रखा है की प्रतिदिन 5 किलोमीटर साइकिल से अपने काम पर जाएंगे पेट्रोल भी बचेगा और सेहत भी अच्छी रहेगी"।
"क्यों भाइयों सही है ना?
"हाँ हाँ... भाई हम सब सेहत के प्रति और वाहनों से होने वाले प्रदूषण के प्रति सचेत हैं"।
"और कमलेश यह तो बताओ यह झोला क्यों टांग के रखा है"
"अरे शर्मा जी लौटते समय कुछ फल वगैरा सब्जियाँ खरीद कर लाते हैं" "पॉलीथिन के बढ़ते दुष्प्रभाव के चलते हम सब ने 1-1 कपड़े का थैला साथ में रख लिया है"।
मोहन बोला
कैप्टन शर्मा आप अगर दुश्मनों से देश की रक्षा करते हो तो हम भी प्रदूषण से लड़कर अपने पर्यावरण की सुरक्षा करते हैं। सेहत की सेहत, खरीददारी, और पर्यावरण की सुरक्षा।
जोर से ठहाका लगाते हुए...
वेरी गुड... यह तो फिर
एक पंथ तीन काज हो गए।
- सुधा दुबे , भोपाल
.jpg)
