उपेक्षा से सम्मान तक: वृद्धजनों के अधिकार, सुरक्षा और सामाजिक उत्तरदायित्व
- डाॅ. राकेश सक्सेना , एटा
भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों को चलता-फिरता ग्रंथ, ज्ञान का कोष और संस्कारों का वाहक माना जाता है। ये पीपल के पेड़ की भाँति खुद धूप-छाँव सहते हैं किन्तु पूरी शाखा को छाया देते हैं। इनका आशीर्वाद सुरक्षा कवच जैसा होता है। ' मातृदेवो भव, पितृदेवो भव ' जैसे वैदिक आदर्श बुजुर्गों के प्रति सम्मान की भावना को प्रकट करते हैं किन्तु आज आधुनिकता, नगरीकरण, उपभोक्तावाद और संयुक्त परिवारों के विघटन ने बुजुर्गों की स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। आज अधिकांश वृद्धजन उपेक्षा, अकेलापन, हिंसा, आर्थिक शोषण, मानसिक उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं और वृद्धाश्रमों में अपना जीवन गुजार रहे हैं, इसलिए दुनिया भर में वृद्ध लोगों के प्रति भेदभाव, दुर्व्यवहार और उपेक्षा की ओर समाज का ध्यान आकर्षित करने व उन्हें सुरक्षित माहौल प्रदान करने के उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ' विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस ' 15 जून को मनाया जाता है।इस अभियान की शुरुआत जून 2006ई०में बुजुर्ग दुर्व्यवहार की रोकथाम के लिए अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क द्वारा की गई थी तथा वर्ष 2011ई० में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मान्यता प्रदान की गई।
प्राचीन काल में परिवार के वरिष्ठ सदस्य निर्णयकर्ता, मार्गदर्शक और नैतिक मूल्यों के संरक्षक माने जाते थे। संयुक्त परिवार व्यवस्था थी, पीढ़ियों के बीच सतत संवाद बना रहता था, अनुभव आधारित सामाजिक प्रतिष्ठा थी, आर्थिक और भावनात्मक सुरक्षा मिलती थी किन्तु वर्तमान में एकल परिवार होने से वृद्धजन स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ, आर्थिक निर्भरता, सामाजिक अलगाव, भावनात्मक असुरक्षा, पारिवारिक उपेक्षा, तकनीकी परिवर्तन के साथ सामंजस्य की कठिनाई उत्पन्न हो रही है। आधुनिक समाज में उपयोगिता आधारित सोच बढ़ रही है। उत्पादन और आर्थिक योगदान को महत्व मिलने से वृद्धजन उपेक्षित हो रहे हैं, नई और पुरानी पीढ़ी के विचारों में बढ़ती दूरी संवादहीनता को जन्म दे रही है, बच्चों का विदेश या अन्य शहरों में प्रवासन अकेलेपन का कारण बन रहा है।
वृद्धजनों के विरुद्ध शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक दुर्व्यवहार, सामाजिक व चिकित्सकीय उपेक्षा जैसी गम्भीर समस्याएँ हैं जिसके कारण समय पूर्व मृत्यु का खतरा, अवसाद, चिंता, आत्मविश्वास में कमी, जीवन के प्रति निराशा का होना, वृद्धाश्रमों में रहना आज के समय में आम बात हो गई है। शहरों की चमक-दमक, विलासितापूर्ण जीवन जीने की ललक एवं आगे निकलने की होड़ ने वृद्धजनों को पीछे धकेल दिया है। भारत सरकार एवं राज्य सरकारों ने वृद्धजनों के लिए अनेक योजनाएँ चलायी हैं फिर भी वृद्धजन अशक्त व कमजोर हैं तो कल्याणकारी योजनाओं और संवैधानिक उपचारों का कोई अर्थ नहीं है। वृद्धजनों को भी जीने का अधिकार प्राप्त है। सरकारी योजनाओं के साथ वृद्धजनों की सुरक्षा और सम्मान परिवार द्वारा किया जाना अपेक्षित है। नियमित संवाद स्थापित कर, भावनात्मक सहयोग व सम्मानजनक व्यवहार के साथ उनकी देखभाल की जा सकती है। सामाजिक स्तर पर वरिष्ठ नागरिक क्लबों की स्थापना, सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, सामाजिक सहभागिता, जागरूकता अभियान, पीढ़ियों के बीच संवाद कार्यक्रम जैसे आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।
अंतत: हम कह सकते हैं कि वृद्धजन हमारे समाज की अमूल्य धरोहर हैं। इनकी सबसे बड़ी सेवा उनके प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना है। हमें यह समझना होगा कि आज के वृद्ध कल के युवा थे और आज का युवा भविष्य का वृद्ध है। वृद्धावस्था तो जीवन की सम्माननीय स्वाभाविक अवस्था है। किसी भी व्यक्ति को आयु के कारण उपेक्षित, तिरस्कृत व असुरक्षित नहीं किया जाना चाहिए। इनके अधिकारों की रक्षा, उनकी सुरक्षा तथा सम्मानपूर्ण जीवन प्रदान करना परिवार, समाज व सरकार तीनों की साझा जिम्मेदारी है।
- डाॅ. राकेश सक्सेना
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष,
68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001*
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