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गुरु पूर्णिमा पर्व विशेष : ज्ञान के प्रकाश का स्मरण और कृतज्ञता का पावन आह्वान- विजय प्रकाश पारीक स्तंभकार


पद्मविभूषण महामंडलेश्वर जगदगुरु शंकराचार्य ब्रह्मलीन स्वामी श्री सत्यमित्रानंद जी गिरि महाराज

 गुरु पूर्णिमा पर्व विशेष : 

ज्ञान के प्रकाश का स्मरण और कृतज्ञता का पावन आह्वान

- विजय प्रकाश पारीक स्तंभकार

प्रस्तुति डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर

    सनातन धर्म और संस्कृति में कुछ पर्व ऐसे होते हैं जो केवल तिथि या अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहते; वे जीवन दर्शन का रूप ले लेते हैं। गुरु पूर्णिमा उनमें से एक है। आषाढ़ की पूर्णिमा का यह दिन गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, अज्ञान के अंधकार से निकलने और आध्यात्मिक संकल्पों की नई शुरुआत करने का अवसर बन जाता है। यह केवल परंपरा का निर्वाह नहीं, बल्कि उस गहरे बोध का स्मरण है कि मनुष्य अकेले ज्ञान की यात्रा पूरी नहीं कर सकता।

इस दिन की सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण पहचान महर्षि वेदव्यास से जुड़ी है। वेदव्यास जयंती के रूप में भी जाना जाने वाला यह पर्व उस महापुरुष को समर्पित है जिन्होंने चारों वेदों का वर्गीकरण किया, महाभारत की रचना की और पुराणों के माध्यम से ज्ञान की धारा को लोक-मानस तक पहुँचाया। व्यास को प्रथम गुरु माना जाता है क्योंकि उन्होंने ज्ञान को व्यवस्थित किया और उसे पीढ़ियों तक सुरक्षित रखने का मार्ग खोला। ‘गु’ का अर्थ अंधकार या अज्ञान और ‘रु’ का अर्थ निरोधक—इस व्युत्पत्ति में ही गुरु का सार छिपा है। गुरु वह है जो जीवन से अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर प्रकाश की ओर ले जाता है। साधकों के लिए यह दिन आध्यात्मिक नववर्ष जैसा है, जहाँ पुरानी आसक्तियों को छोड़कर नए संकल्प लिए जाते हैं।

वैदिक काल से लेकर आज तक गुरु-शिष्य संबंध का स्वरूप बदला है, पर उसका मूल भाव जीवित रहा है। वैदिक युग में गुरुकुल परंपरा थी। शिष्य गुरु के आश्रम में रहकर ब्रह्मचर्य, शास्त्र और शस्त्र की शिक्षा ग्रहण करता था। ज्ञान केवल पुस्तकीय नहीं था; वह आत्मिक संबंध का हिस्सा था। गुरु और शिष्य के बीच विश्वास, सेवा और समर्पण का पवित्र बंधन बनता था। मध्यकाल में भक्ति आंदोलन ने इस परंपरा को नया आयाम दिया। कबीर, तुलसी और मीरा जैसे संतों ने गुरु को ईश्वर प्राप्ति का मार्गदर्शक माना और कभी-कभी तो गुरु को भगवान से भी ऊँचा स्थान दिया। ज्ञान का मार्ग अब केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं रहा; वह भक्ति और अनुभव से भी जुड़ गया।

आधुनिक काल में यह रूप संस्थागत और डिजिटल हो चुका है। शिक्षा विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और ऑनलाइन माध्यमों से पहुँचती है। गुरु पूर्णिमा पर व्यक्तिगत मिलन की जगह सोशल मीडिया पर बधाई संदेश भेजने का चलन बढ़ गया है। सुविधा तो मिली है, पर गहराई का प्रश्न बना रहता है। क्या ज्ञान अब भी उसी आत्मिक संबंध के साथ हस्तांतरित हो रहा है, या वह सूचनाओं के आदान-प्रदान तक सिमट गया है? यह प्रश्न हमें सोचने पर मजबूर करता है।

इसी सोच के साथ सतर्कता भी आवश्यक है। आज के युग में पाखंडी गुरुओं की संख्या बढ़ी है। जो चमत्कार, भस्म या ताबीज से समस्याओं का समाधान करने का दावा करते हैं, उनसे दूर रहना चाहिए। जो ज्ञान के बदले मोटी रकम, संपत्ति या व्यावसायिक लाभ की माँग करते हैं, वे सच्चे गुरु नहीं हो सकते। सच्चे गुरु का आचरण सदैव पवित्र और मर्यादित होता है। अंतरात्मा की आवाज सुनना और विवेक को किसी के प्रभाव में खो देना—यह सतर्कता ही सच्चे मार्ग की पहली शर्त है।
वेदांत इस विषय पर और भी स्पष्ट दृष्टि देता है। सच्चा गुरु ‘श्रोत्रिय’ अर्थात् वेदों का ज्ञाता और ‘ब्रह्मनिष्ठ’ अर्थात् जिसका मन पूर्णतः ब्रह्म में लीन हो, वही होता है। वह शिष्य को संसार के बंधनों से मुक्त कराकर ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का बोध कराता है। गुरु कोई हाड़-मांस का शरीर मात्र नहीं, बल्कि ज्ञान का साक्षात स्वरूप और परमात्मा की चेतना है जो शिष्य का मार्गदर्शन करती है। यह दृष्टि गुरु को उपाधि से ऊपर उठाकर अनुभव के स्तर पर ले जाती है।

गुरु पूर्णिमा इसलिए केवल याद करने का दिन नहीं, बल्कि अपने जीवन में गुरु-तत्व की खोज का दिन है। चाहे वह माता-पिता हों, शिक्षक हों, कोई अनुभवी मार्गदर्शक हों या स्वयं का अंतःकरण—जो अज्ञान को दूर करे, वही गुरु है। इस पावन अवसर पर कृतज्ञता व्यक्त करें, विवेक को जाग्रत रखें और ज्ञान के प्रकाश को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें। क्योंकि सच्चा गुरु-शिष्य संबंध कभी समाप्त नहीं होता; वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान की ज्योति को जीवित रखता है।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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