काव्य :
ज्ञान के भंडार गुरू
हम शिष्यों के गुरू ही भाग्य विधाता
सद्ज्ञान हमें गुरुओं से है आता।
संसार में सर्व प्रथम गुरु का हो वंदन,
ज्ञान के भंडार गुरुओं को शत्-शत अभिनंदन।
सच्चाई ही राह ,सदा हमें दिखलाते हैं
बुराइयों को, हमारे जीवन से दूर भगाते हैं,
गोविन्द से पहले करते,गुरु देवों को नमन।
ज्ञान के भंडार गुरुओं को शत्-शत्- अभिनंदन।
विद्या के दान से हमें योग्य बनाते हैं।
ऊंचे शिखर पर हमें देख , गर्व का अनुभव पाते हैं ।
गुरुओं के आशीष से ही हमारे एवरेस्ट पर हैं चरण,
ज्ञान के भंडार गुरुओं को , शत्-शत् अभिनंदन।
अपने शिष्यों को हौसला दे कर मन मजबूत बनाते हैं कठिनाइयों की डगर, गुरु ही सहर्ष सजाते हैं।
आगे बढ़ते रहने का, देते ,सदा ही प्रोत्साहन।
ज्ञान के भंडार गुरुओं को शत-शत अभिनंदन।
आरुणी की गुरु भक्ति, हमें यही सिखलाती है।
गुरु के प्रति जीवन न्योछावर, सच्ची भक्ति कहलाती है।
गुरु से ही गुलजार है, ज्ञान का यह चमन।
ज्ञान के भंडार गुरुओ को शत्-शत् अभिनंदन।
हांथ बच्चों का थाम, पढ़ लिख बढ़ना सिखाया है
गुरु की डांट ने मार्ग, हमारा प्रशस्त बनाया है।
ऋण न चुका पाएंगे, जो गुरु ने दिया है ज्ञान धन।
ज्ञान के भंडार गुरुओ को, शत-शत अभिनंदन ।
ज्ञान का प्रकाश सदैव, गुरु ही तो फैलाते हैं।
संसार रुपी उपवन को, सदज्ञान से महकाते हैं।
गुरुदेवों की सिख यही , रहें सदा ही स्वावलंबन ।
ज्ञान के भंडार गुरुओ को, शत्-शत् अभिनंदन
जवान औषध हैं मातृभूमि के देश रक्षा में खड़े सैन्य सुषेण हैं
थल, जल, नभ के रक्षक बने अदम्य साहस करते भर्षेण हैं
देश प्रेम और भक्ति मन में गुरू करते हैं बीजारोपन
ज्ञान के भंडार गुरुओं को शत्-शत्- अभिनंदन ।
समाज का कल्याण गुरू से नैतिक मूल्यों का विकास गुरु से
सदाचार और सुविचार का होता सदा सदा ही संचार गुरु से
छात्रों की तार्किक क्षमता का करते शिक्षक ही शनै:शनै: पोषण
ज्ञान के भंडार गुरुओं का शत्-शत् अभिनन्दन
शत्-शत् अभिनन्दन।
- अंजना दिलीप दास
बसना, महासमुंद (छ.ग)
.jpg)
