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इरादे बनाम बहाने - विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल


 इरादे बनाम बहाने

 - विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल 


     जीवन यात्रा में दो पहलू सदैव साथ चलते हैं  इरादे और बहाने। इरादे हमें मंज़िल तक पहुँचाने का वादा करते हैं, तो बहाने हमें रास्ते से भटकाकर स्वयं की संतुष्टि का झूठा अहसास दिलाते हैं। ये दोनों ही मानव मन की उन गहराइयों से उपजते हैं जहाँ आशा और निराशा, साहस और भय, दृढ़ता और आलस्य का निरंतर द्वंद्व चलता रहता है। हर साल दिसंबर में नए साल के लिए ढेर सारे संकल्प लिए जाते हैं पर जनवरी के पहले दूसरे हफ्ते में ही बहाने ज्यादातर लोगों के उन संकल्पों की धज्जियां उड़ा देते हैं। 

 इरादा वह दृढ़ संकल्प है जो मनुष्य को विषम परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रखता है। इतिहास साक्षी है कि महान आविष्कारों और खोजों के पीछे लौह इरादों की शक्ति रही है। चंद्रयात्रा हो या हिमालय की चोटी पर पहुँचने का साहस, सब कुछ इरादों की दृढ़ता से ही संभव हुआ है। इरादे व्यक्ति के आत्मविश्वास को पंख देते हैं, जिससे वह असंभव को संभव कर दिखाता है।

 दूसरीओर बहाने वे मनोरम जाल हैं जिनमें फँसकर व्यक्ति स्वयं को असफलताओं से बचाने का प्रयास करता है। बहाने अक्सर समस्याओं के समाधान नहीं, बल्कि उनसे पलायन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ये हमारे आलस्य, भय और प्रयासों से बचने की मानसिकता की उपज होते हैं। बहाने बनाना सरल होता है, क्योंकि इसमें केवल स्वयं को समझाने की कला चाहिए, जबकि इरादों को पूरा करने के लिए कठोर परिश्रम और अनुशासन की आवश्यकता होती है।

इरादे और बहानों का मनोविज्ञान समझना महत्वपूर्ण है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से  इरादे हमारे अहं के उच्चतम स्तर की अभिव्यक्ति हैं, जबकि बहाने आत्म-सुरक्षा के तंत्र हैं। इरादे हमें बाह्य कारणों से मुक्त कर आंतरिक शक्ति से जोड़ते हैं, जबकि बहाने हमें बाह्य कारणों के आधार पर स्वयं को सांत्वना देने का साधन प्रदान करते हैं।

 बड़े परिदृश्य में विश्व में भी इरादे और बहानों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विकसित राष्ट्रों की कहानियाँ मज़बूत इरादों की गाथाएँ हैं, जबकि पिछड़े राष्ट्र अक्सर संसाधनों के अभाव के बहाने बनाते हैं। व्यक्ति और समाज का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि वह इरादों को कितना महत्व देता है और बहानों को कितना नज़रअंदाज़ करता है।इरादे और बहाने हमारे चरित्र और व्यक्तित्व को परिभाषित करते हैं। इरादे हमें ऊँचाइयों तक पहुँचाते हैं, जबकि बहाने हमें सामान्य स्तर पर ही सीमित बनाए रखते हैं। एक सार्थक जीवन वही है जहाँ इरादे मज़बूत हों और बहाने नगण्य।  कबीर ने कहा था  "करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान", अर्थात निरंतर प्रयास और दृढ़ इच्छाशक्ति से मनुष्य कुछ भी प्राप्त कर सकता है। आदर्श स्थिति यही है कि हमें अपने इरादों को इतना मज़बूत बनाना चाहिए कि बहानों के पास हम तक पहुँचने का कोई रास्ता ही न बचे और हमारे संकल्प फलीभूत हों । मार्ग की कठिनाई सुनिश्चित प्रक्रिया है, जिन पर पक्के इरादों से ही विजय प्राप्त हो सकती है।


 - विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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