काव्य :
आत्मबोध
अपनों में ही गिराने की आज़माइश है,
यह जानकर संभलना चाहिए था।
भाग कर आया है जहाँ से,
उसे तो ठहर जाना चाहिए था।
राह में हौसला-शिकन होंगे मगर,
टूटे हुए मन से लड़ना चाहिए था।
परेशान रहा यूँ ही मुसीबतों से,
हक़ीक़त जानकर मुस्कुराना चाहिए था।
इंतज़ार हो जब तुम्हारी हार का,
वहीं से जीत जाना चाहिए था।
जो बदलाव चाहते हैं दूसरों पर,
एक बार खुद को बदलना चाहिए था।
- उमेन्द्र निराला सतना (माध्यप्रदेश )
अध्ययन - इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रयागराग (उ. प्र.)
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