काव्य :
एक अधूरा ख्वाब
मैने भी देखा था कभी
छोटा सा एक सपना ,
पूरा करने की चाह थी
नहीं चाहता था थकना ।
वक्त की थपेड़ ने ,
न जाने कब बड़ा बनाया ,
बचपन के साथ छिन लिया ,
सर से पिता का साया ।
पिता के संग संग ही ,
पिता का घर बार छुट गया ,
कच्ची सी उमर में ही ,
किस्मत मुझसे रूठ गया ।
छोटी सी मुट्ठी में मैं ,
मेरे कुछ ख्वाबों को समेट गया ,
मां और छोटे भाई को संभालते हुए ,
ख्वाब फिसले ,जैसे मुठ्ठी से रेत गया ।
ज़िम्मेदारी नन्हे कांधे पर थे ,
करने थे पूरे अब भाई के ख्वाब ,
अधूरे पढ़ाई के साथ खड़ा हुआ पैरों पर ,
सबके लिए जीते जीते दब गया ।
" मेरा एक अधूरा ख्वाब "
- अंजना दिलीप दास
बसना छत्तीसगढ़
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