असंयमित जीवनशैली और बढता तापमान
- देवेन्द्र कुमार रावत ,भोपाल
क्या हमने इस संदर्भ में कभी गंभीरता से विचार किया है कि हमारी असंयमित जीवन शैली के कारण ही तापमान का संतुलन बिगड़ रहा है जिसके कारण समुद्र अपनी सीमाएँ लाँघने लगा है । आकाश से कहीं अतिवृष्टि होती है तो कही सूरज आग वरसाता है कहीं वायु का प्रचंड वेग जनजीवन को तहस-नहस कर देता है । कहीं भूकंप तबाही लाते है कहीं अतिवृष्टि से विनाशकारी बाढ़ आती है तो अल्पवर्षा अकाल की स्थिती उत्पन्न कर देती है । विश्व के वैज्ञानिक भी इन पर्यावरणीय दुष्प्रभावों के पीछे तापमान के असंतुलन को सबसे बड़ा उत्तरदायी कारण मानते हैं । भौतिक दृष्टि से यह सही भी है । इस संदर्भ में विज्ञान इन पंच तत्त्वों के उपभोग पर ज्यादा शोध करता है, तो अध्यात्म इनकी मर्यादा की बात स्पष्ट करते हुये मानव जीवन का सीधा संबंध ज्ञान ,कर्म ,धर्म ,प्रकृति और ईश्वरीय सत्ता से जोड़ता है । तव क्या विज्ञान और अध्यात्म की समन्वित दृष्टि से विचार का समय है कि हम सब कैसे इस प्रदूषण के रक्तबीज को पूरी तरह से समाप्त कर ,सुखी संपन्न जीवन जी सकते हैं । हमारे धर्मशास्त्रो में तो विज्ञान और अध्यात्म के संबंध को स्पष्ट करते हुये वताया है कि मानव शरीर भी इन्हीं पंच तत्त्वों से बना है , वर्णन आया है:-
क्षिति जल पावक गगन समीरा ।
पंच रचित अति अधम शरीरा ॥
अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु इन पांच तत्वों से यह अत्यंत अधम (साधारण) शरीर रचा गया है । इन पंच तत्त्वों की भी एक मर्यादा है सुंदरकांड में समुद्र मार्ग की याचना करने पर भगवान श्री राम से स्वयं पर सेतु निर्माण के संबंध में यही कहता है :-
गगन समीर अनल जल धरनी ।
इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी ॥
तव प्रेरित मायाँ उपजाए ।
सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए ॥
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं ।
मरजादा पुनि तुम्हारी कीन्हीं ॥
अर्थात् हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इन सबकी करनी (स्वभाव) स्वभाव से ही जड़ है । आपकी प्रेरणा से ही माया ने इन्हें सृष्टि के लिए उत्पन्न किया है, सभी ग्रंथों ने यही गाया है । यदि आपके प्रताप से मैं सूख भी जाऊं, तो उसमें मेरी बड़ाई नहीं है, क्योंकि तब मेरी मर्यादा नहीं रहेगी । इसी संदर्भ में विचार करें तो विज्ञान द्वारा बनाए गए सभी उपकरणों में भी इन पंच तत्त्वों के गुण- धर्म की मर्यादा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दिखाई देती है । किंतु मनुष्यों में एक चेतन' तत्त्व भी है । जो हमें बुद्धि और विवेक के द्वारा यह बोध कराता है कि इन पांच तत्त्वों के मूल स्वरूप को प्राकृतिक रूप में कैसे बनाए रखें , अन्यथा उनके प्रदूषित होने पर न तो हम स्वस्थ रह सकते हैं , न ही प्रकृति भी हमारे अनुकूल रह सकती है । वर्तमान में हम प्रत्यक्ष देख भी रहें हैं कि आवश्यकता से अधिक रसायनों का प्रयोग एवं घातक शस्त्रों के दुष्प्रभावों से न केवल समस्त प्राणी, बल्कि प्राकृतिक पस्थितियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । तब इसे कैसे रोका जा सकता है ? श्री रामचरितमानस के मूल रचयिता संहार के देवता भगवान शिव की कृपा से गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान श्री राम और समुद्र के संवाद के माध्यम से यह समाधान संसार के समक्ष रखा है कि,श्री रामचंद्र जी में तेज, बल की अधिकता इतनी है कि वे एक ही बाण से सैकड़ों समुद्रों को सुखा सकते हैं ,फिर भी वे नीति के अनुसार श्री राम जी लंका जाने के लिए समुद्र पर सेतु निर्माण का उपाय वानरराज सुग्रीव और विभीषण से पूछते हैं ,ताकि सेतु निर्माण में समुद्री जीव जंतुओं की सुरक्षा के साथ उसके पारिस्थितिक तंत्र की हानि भी न हो । तो क्या प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए हम वैज्ञानिक दृष्टि के अलावा हम भी आध्यात्मिक संदर्भ में सोच सकते हैं ? किन्तु वर्तमान में तो तापमान वृद्धि रोकने के लिए केवल कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण पर ध्यान दिया जा रहा है , क्योंकि हम अत्यधिक सुविधाओं के आदी होने से ऊर्जा का अत्याधिक उपभोग कर रहे हैं । क्या , हमारी यही अज्ञानता का उत्सर्जन वायुमंडल के तापमान में वृद्धि का कारण नहीं है ? विज्ञान कहता है कि तापमान के बढ़ने से ही तो अत्यधिक वाष्पीकरण होता है परिणाम स्वरूप वायुमंडल में संघनन की तीव्रता से प्रलयंकारी बादल बनते हैं । ये मेघ जब बरसते हैं तब जल प्रलय ला देते हैं । वहीं सीमा से अधिक तापमान बढने से न्यून वायुदाव के केंद्र अंततः चक्रवात में बदल जाते हैं । जिससे तटों पर विनाशकारी तूफ़ान आते है । समुद्रों का तापमान बढ़ने से (अलनीनो) वाष्प भरी हवाओं को थल भाग की ओर जाने से रोकता है । अतः इस संदर्भ में यह वर्णन है कि त्रेतायुग के रामराज्य में तापमान का संतुलन था , प्रकृति अनुकूल रहती थी, शोध का विषय है । वर्णन आया है :-
मांगे बारिद देइ जल , रामचन्द्र के राज
अर्थात् बादल उतना ही वर्षा करते हैं जितनी आवश्यकता होती है । क्योंकि लोगो की जीवन शैली संयमित थी । इसी संदर्भ में आगे वर्णन आया है:-
बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग ।
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग ॥
अर्थात् सभी मनुष्य वेदों में बताई गई मर्यादा का पालन करते थे । तो जब मनुष्य मर्यादा में रहते हैं , तब प्रकृति भी मर्यादित रहती है । वर्णन आया है :- “ सागर निज मर्यादा रहही” अर्थात समुद्र अपनी मर्यादा में रहता है । वैज्ञानिक दृष्टि से समझें तो तापमान के संतुलन से समुद्र का अपनी मर्यादा में रहना ही जलप्रलय को रोकना है । यह प्रकृति का अद्भुत संयम है । क्योकि भूगोल के अनुसार पृथ्वी पर 79%भाग पर जल है और शेष 21% भाग पर थल है । अतः स्पष्ट है कि सुखी-संपन्न जीवन के यही दो पक्ष हैं । विज्ञान और अध्यात्म । इनका हमारे जीवन में समन्वय है तो प्रकृति भी अनुकूलता दिखाती है, अन्यथा अकेला भौतिक विकास विनाश का कारण बनता है । जैसा कि सुन्दरकाण्ड में वर्णन आया है कि राक्षसों की स्वछंद जीवन शैली से पीड़ित समुद्र ने ही श्री राम औरप उनकी सेना को लंका जाने के लिए सेतु का निर्माण का उपाय सुझाया था । ताकि रावण की लंका का विनाश हो सके । साथ ही समुद्र भगवान श्री राम से अपनें उभयतटों की रक्षा का आश्वासन मिलने पर ही उनकी वंदना करते हुये प्रसन्नता पूर्वक अपने भवन चला गया । परिणाम स्वरूप रावण की स्वर्णमयी लंका जो सब प्रकार से समृद्ध एवं भौतिक दृष्टि से शक्तिशाली थी ,अन्ततः सर्वनाश को प्राप्त हुई ।
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