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डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का मानवतावादी दर्शन और मराठी साहित्य - डॉ. लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र)



डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का मानवतावादी दर्शन और मराठी साहित्य

- डॉ. लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र)


"जिस हृदय में जतन की सहिष्णुता 

उसी हृदय में जगाया तुमने ज्वालामुखी विद्रोह 

तुम्हारा विद्रोह नही था अज्ञानी- अंधा 

वह था खुद को बदलनेवाला, 

जग को बदलनेवाला 

नयी आंखे, नये हृदय"

मराठी कवी – नामदेव ढसाल (तुही इयत्ता कंची:पृ.८२)

( मूल मराठी कविताओंका  इस आलेख के लिए हिंदी अनुवाद किया है।)

डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर के लिये लिखी यह कविता  कवी नामदेव ढसाल जी की हैं।यह कविता विद्रोह से चिंतन और जन समूह द्वारा मानवमुक्ती का प्रयास दर्शाती हैं। आरंभिक स्थिती में विद्रोह ही आंबेडकरी आंदोलन का केंद्र था।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर (१८९१-१९५६) 

डॉ. आंबेडकर द्रष्टा थे।सबसे पहले उन्होने स्वतंत्र मजदूर पक्ष (1936) में स्थापित किया। जिसके द्वारा भारत में हो रहा आर्थिक शोषण और सामाजिक विषमता का निर्मूलन करना उनका उद्देश्य था। शिक्षा के बिना समाज का विकास असंभव हैं, इस बात का उनको अनुभव था।इसलिये उन्होने  ‘पीपल्स एज्युकेशन सोसायटी’ को १९४५ में स्थापित किया। इस सोसायटी के द्वारा ‘सिद्धार्थ महाविद्यालय’ (मुंबई), ‘मिलिंद महाविद्यालय’ (औरंगाबाद) में शुरू किए ।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर बौद्ध दर्शन से प्रभावित थे। *‘मेरा तत्वविचार यदि आपकी बुद्धी स्वीकारती है, अनुभव कि कसौटी पर खरा उतरता हैं, तो उसे स्वीकारो। – गौतम बुद्ध’*

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर बौद्ध दर्शन को दुबारा कसौटी पर परख रहे थे। १९५६ में उन्होने बौद्ध धम्म कि दीक्षा लियी। लेकिन उन्होने स्पष्ट किया था, ‘पारंपरिक बौद्ध धर्म को मैं स्वीकारता नही।’ उन्होने बौद्ध धम्म के *‘विद्या,प्रज्ञा, करुणा, शील और मित्रता’* इन पांच तत्वों को महत्त्व देने का आवाहन किया।   डॉ. बाबासाहेब द्वारा लिखे गये ग्रंथ अवश्य पढें जाने चाहिए।सभी ग्रंथों कि सूची इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। 

भारत में आजादी के बाद  भी मानवी हकों के लिये काफी आंदोलन चल रहे हैं।भारतीय संविधान का मूलाधार स्वातंत्र्य, समता और बंधुता हैं। इन सभी मूल्यों को स्थापित करने में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का बडा योगदान हैं।यहां संक्षिप्त रूप में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का  कार्य   दिया  है। जो मराठी दलित साहित्य को समझने  के लिये भी जरुरी हैं।

मराठी साहित्य में १९७० के बाद ‘दलित साहित्य’ ने अपनी अलग पहचान बनाई। उस समय १९७२ में  ‘दलित पैंथर’ नामक संगठन कि महाराष्ट्र में स्थापना हो गयी थी। इस संगठन के कार्यकर्ता राजा ढाले और नामदेव ढसाल महाराष्ट्र में विविध आंदोलन के द्वारा  दलित चेतना को जगा रहे थे। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचार उनके आंदोलन का आधार थे।जिनमें ‘शिक्षा,संगठन और संघर्ष’ यह विचार सबके लिए महत्त्वपूर्ण था। राजा ढाले और नामदेव ढसाल  दोनोही  अच्छे वक्ता और लेखक, कवि भी थे। दलितों पर हो रहे अन्याय के विरुद्ध लिखी गयी उनकी कविता, गीत और आलेख प्रकाशित होने लगे थे।मराठी दलित साहित्य शोषण कि वास्तव स्थिती प्रकट कर रहा था।मराठी साहित्य में आद्य लेखकों द्वारा दलितों  के स्थिती का चित्रण  केवल सहानुभूती से लिखा गया था।उस सहानुभूती से हालात बदलते नजर नही आ रहे थे। जबकि इन रचनाकारों की अभिव्यक्ति में अपनी  वेदना, गरीबी और अज्ञान में जकडा दलित  समाज ही  केंद्र रहा।जिसके कारण उनका  आर्थिक सामाजिक,मानसिक तथा राजकीय शोषण हो रहा था। उस विषमता को यह रचनाकार अपनी कलम से  उजागर करने लगे। 

अब आज के समय में यह मुद्दा बन रहा है कि, दलित साहित्य जातीवाचक माना जा रहा हैं, जो गलत है। इस साहित्य की नींव महात्मा फुले और डॉ. आंबेडकर प्रणित समता और न्याय के तत्वों पर आधारित हैं। इसलिये इस साहित्य को ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ संबोधित करना चाहिये, ऐसा  सुझाव भी कुछ शोधकर्ता दे रहे हैं। साहित्य भी कला की एक शाखा है।कोई कितनी भी समीक्षा करे वह कभी भी  अंतिम नही होती हैं। नयी बातें नये तथ्य सामने आते रहते हैं। जिसका समीक्षा पर प्रभाव पडता हैं।समय समय पर समीक्षा के नये आयाम भी खुलते नजर आते हैं।

शोषित, वंचित समाजमन अपनी निरर्थकता की व्यथा कविता,कहानी, आत्मकत्थ्य, नाटक,एकांकी, आलेख इ. द्वारा व्यक्त करने लगा।  प्रथमतः नामदेव ढसाल, राजा ढाले, बाबुराव बागुल, केशव मेश्राम, वामन होवाल, दया पवार, लक्ष्मण माने, शांताबाई कांबले, उर्मिला पवार, डॉ. गंगाधर पानतावणे, शरणकुमार लिंबाले  जैसे रचनाकारों का  मराठी दलित साहित्य के प्रवाह पर  प्रभाव  रहा।  मराठी साहित्य में इनके लेखन पर  काफी चर्चा और समीक्षा का वातावरण बनता गया। मराठी दलित साहित्य का स्वागत और समीक्षा करने का महत्वपूर्ण कार्य उस समय के समीक्षक प्रो. भालचंद्र फडके और प्रो. रा.ग. जाधव जी ने किया।

कुछ उदाहरण के लिये कविताओं के अंश देखिए, 

"आज विषाद लगता है कैसे सहते रहे इन भारी भरकम बेडियों को

हाथियों का झुंड नदी की गिली रेत में धंस जाये 

वैसे  ही ध्येय – आंकाक्षा धंस गये

बंधे हाथों ने फिर भी कभी आक्रोश  नही किया 

कितने जन्मों से कैद, किसने बनाया यह कोंडवाडा"

(कवी- दया पवार)

दया पवार मूलतः कवी थे। फिर आत्मकत्थ्य ‘बलुतं’ 1978 में  जब प्रकाशित हुआ था, मराठी साहित्य में उसकी  काफी चर्चा होने लगी। ‘बलुतं’ दगडू मारुती पवार की जीवनगाथा है। महाराष्ट्र में बलुतेदारी की परंपरा थी। जो श्रमिक वर्ग को लाचार,परावलंबी और स्वाभिमानशून्य कर चुकी थी। इस वास्तव को दया पवार अधोरेखित कर गये। दलित आत्मकथन आत्मगौरव से दूर रहा। ‘मैं जो हूं, उसी वास्तव के साथ’ को लिखने की परंपरा उन्होने स्थापित कियी।

वामन होवाल जी की कहानी ‘अंगारा’ दलित समूह की विसंगती भी  व्यक्त करती है. इस कहानी में लखूदादा एक मांत्रिक (झाडफूंक करनेवाला) था। जो पहले गांव के लोगों को भूत- प्रेतों की पीडाओं से बचने के लिए अंगारा(भस्म) देता था।जिससे उसका अपना  गुजारा करता था। डॉ. आंबेडकर जी के विचारों से प्रभावित होकर बौद्ध धम्म की दीक्षा लेता है। वह तय करता हैं कि, अब वह मांत्रिक का पुराना काम नही करेगा। बौद्ध धम्म में  इस कर्मकांड को मान्यता नही है। गांव के लोगों को वह यह बात समाझाने के लिये काफी प्रयास करता है लेकिन वह समझ नही पाते। मजबूरन उसको उन्हें अंगारा (भस्म) देना पडता है। अंधश्रद्धा का जनमानस पर प्रभाव कितना गहरा हैं।इस कहानी से इस वास्तविकता का परिचय होता हैं। दलित साहित्य इसलिये महत्त्वपूर्ण रहा जो आत्मपरीक्षण भी कर रहा था। चुनौती को भी  समझ रहा था।

शरणकुमार लिंबाले का ‘अक्करमाशी’ आत्मकत्थ्य भारतीय समाजव्यवस्था में दलित महिलावर्ग के अधिकारों का हनन स्पष्ट कर पितृसत्ताक व्यवस्था को चुनौती देता  है।  उनकी कविता अपना विद्रोह व्यक्त करती हैं.-

"हमारा कोई इतिहास नही, ना उस लिये जीते है 

भविष्य है, भविष्य के लिये लड रहे है 

सारा इतिहास बदलने के लिये 

ह्र्दय अपने खाटिकखाने में टांग दिया हैं मां- बाप को आखिरी सलाम  कर आया हूं"

( कवि- शरणकुमार लिंबाले)

मराठी दलित साहित्य में आत्मकत्थ्य काफी लिखे गये। कविता भी प्रचुर मात्रा में लिखी गयी।उस समय दलित साहित्य में बोली भाषा के जो शब्द आ रहे थे। वह मराठी प्रमाण भाषा के शब्दकोष से लापता थे। फिर बोली भाषा का अभ्यास करना जरुरी हो गया था। मानवी संस्कृति केवल अभिजन वर्ग की बनाई नही हैं, उसके लिये सभी जन जाति के लोगों का योगदान हैं। ऐसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे  भी सामने आते गये।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी के विचार और कार्य मराठी  दलित साहित्य की प्रेरणा है। आगे चलकर अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े  लोगों ने भी आत्मकथ्य लिखना शुरू किया। वेदना - विद्रोह से जुड़े आत्मकथ्य आम लोगों के लिए प्रेरणा बन गए। उसी समय 1975 मे अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष मनाया गया था। नारी मुक्ती आंदोलन भी संघर्षरत हो गया था।

 *हंसा वाडकर जो मराठी फिल्मों की महत्त्वपूर्ण नायिका थी। उनका लिखा ‘सांगते ऐका’ आत्मकत्थ्य पर श्याम बेनेगल ने ‘भूमिका’ (1977)फिल्म बनायी*.जिसमें स्मिता पाटील ने प्रमुख भूमिका निभायी थी।

 भारतीय साहित्य,सिनेमा, कला और वैचारिक आंदोलन की दृष्टी से  १९७० से ८० का दशक महत्त्वपूर्ण रहा है। समानांतर सिनेमा का दौर भी इसी दशक का हिस्सा है। लेकिन जिस परिवर्तन के लिये, समानता के लिये नारीवादी आंदोलन, छात्र आंदोलन जैसे विषमता निर्मूलन  करनेवाले आंदोलन हो रहे थे। २००० के अंत में आया वैश्विकरण का दौर इनका जोश खत्म करता गया।  यह भी एक वास्तव है।

इस संक्षिप्त मंथन से इस बात पर जोर देना चाहिये की, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर हम सबके नेता है। उनके मानवतावादी विचार हम सबको भविष्य में भी प्रेरणा देते रहेंगे। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी को सादर अभिवादन! 

द्वारा – लतिका जाधव , पुणे 

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

2 Comments

  1. संपादक, श्री. देवेंद्र भाई सोनी जी,

    मेरा आलेख प्रकाशित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

    लतिका जाधव

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  2. बहुत सुंदर और सारगर्भित लेख के बधाई। बाबा साहेब जैसे प्रतिभाशाली बिरले ही होते हैं। उनके विचार समझने के लिए हमें उनका साहित्य पढ़ना और हृदयंगम करना चाहिए। बहुत बहुत बधाई।

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