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हेमंत स्मरण हुआ अविस्मरणीय


 

हेमंत स्मरण हुआ अविस्मरणीय 

भोपाल । 23 मई 2026 ,संभावना शील युवा कवि स्वर्गीय *हेमंत* के जन्मदिन पर अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच ने उन्हीं की कविताओं का पाठ करके उन्हें रचनात्मक श्रद्धांजलि दी।

हेमंत के कविता संग्रह  *मेरे रहते* में संकलित उनकी रचनाओं के पाठ की विशिष्ट गोष्ठी गूगल मीट पर आयोजित की गई, जिसमें पूरे देश और सुदूर विदेश में बसे 50 से ज्यादा साहित्यिक साथी शामिल हुए। 

इस अवसर पर संचालन करते हुए *महिमा श्रीवास्तव वर्मा* ने कहा कि "समय की धारा बहुत कुछ बहा ले जाती है,पर कुछ नाम ऐसे होते हैं,जो समय के जल पर नहीं, हृदय की शिला पर लिखे जाते हैं। हेमंत भी ऐसी ही अमिट अनुभूति हैं। कविता के रूप में उनकी स्मृतियाँ अब भी इस वातावरण में सुवास की तरह तैर रही हैं,उनकी रचनाएँ अब भी मन की वीणा पर धीमे -धीमे बज रही हैं।आज की यह संध्या मानो स्मृतियों का एक दीपोत्सव बन गई, जहाँ हर शब्द ने उन्हें पुकारा,हर स्वर ने उन्हें महसूस किया और हर आँख ने अपने भीतर एक नम उजाला संजो लिया। 


कार्यक्रम का शुभारंभ सुश्री *जया आर्य* की विशिष्ट सरस्वती वंदना द्वारा हुआ। 

  स्मृतियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं। वो समय की किताब पर सुवासित पृष्ठ बनकर रह जाती हैं। *डॉ. प्रमिला वर्मा* ने हेमंत के व्यक्तित्व से जुड़ी बातें बताते हुए  स्मृतियों का मंथन किया। 

 एक माँ के लिए पुत्र केवल एक संबंध नहीं होता,संतान के जन्म के साथ वह अपने हृदय का विस्तार करती है। संतान उसकी आत्मा अंश होती है और जब वही अंश स्मृतियों में बदल जाता है तो हर याद पूजा बन जाती है,हर साँस प्रार्थना हो जाती है। 

 संतोष श्रीवास्तव ने कहा कि मैं आज आभार नहीं दूँगी। हेमंत अब मेरा रहा कहां ,अब वह आप सबका हो गया। एक हेमंत खोकर मैंने उसकी स्मृति में*हेमंत स्मृति कविता सम्मान* से पुरस्कृत बहुत सारे हेमंत पा लिय

दिवंगत कथाकार पत्रकार स्व. अवधेश प्रीत ने हेमंत स्मृति पुरस्कार समारोह के लिए जो पंक्तियाँ हेमंत के लिए लिखकर भेजी थीं, उन्हें *रानी सुमिता* ने पढ़ा। 

शब्दों के भीतर छिपे संवेदनात्मक सत्य को पहचानने की विलक्षण क्षमता रखने वाली लेखिका *डॉ. नीलिमा रंजन* ने हेमंत की पुस्तक "मेरे रहते" की भावों से भरी समीक्षा की। 

हेमंत की इसी पुस्तक से उनकी 

कविताओं का वाचन किया गया। 

शेफालिका श्रीवास्तव-बसंत, मुजफ्फर सिद्दीकी -बस इतना, जया केतकी- मेरे रहते, गिरिजेश सक्सेना-पतझड़ , शकुंतला मित्तल -कबीर, अर्चना पंड्या -विश्वास करो, वंदना रानी दयाल-मुझे जियो, डॉ .शुभ्रा -गरीब की बेटी,मृदुला मिश्रा - जीवन क्रम,  सत्यवती मौर्य- मन पर बिखर गए,  मीता अग्रवाल - नियमों से बंधी धरती, क्षमा पांडे-लौटा दो, ज्योति गजभिए -ओ लहर मनचली, साधना वैद्य-सुगंध छुपती नहीं,डॉ.विनीता राहुरिकर-तुम हँसी ,मधुलिका सक्सेना -न मैं मंदिर, न मैं मस्जिद, सरस दरबारी-लौट नहीं  पाऊँगा, शीर्षक से रचनाओं का पाठ किया।

सबने हेमंत को याद कर इस संध्या को अविस्मरणीय बना दिया। 

प्रस्तुति

महिमा श्रीवास्तव वर्मा

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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