लघुकथा :
मंच पर तालियाँ और घर पर...
महिला दिवस के समारोह में उसे सम्मानित किया गया।
मंच से घोषणा हुई—
“परिवार और समाज को समान रूप से संभालने वाली सशक्त नारी।”
तालियाँ देर तक बजती रहीं।
शाम को वह घर लौटी।
रसोई में बर्तन बिखरे थे।
नौकरानी खाना बनाकर जा चुकी थी।
बचा हुआ खाना मेज़ पर ही रखा था।
धुले कपड़े मशीन में पड़े थे।
सोफे और कुर्सियों पर धूल का सम्राज्य था।
उसने पूछा,
“ये सब…?”
पति का जवाब आया,
“हमें क्या पता… वो आई थी, काम करके चली गई।”
वह चुपचाप साड़ी का पल्लू कमर में खोंसकर बर्तन समेटने लगी।
मेज़ पर रखा महिला-दिवस का सम्मान-पत्र हवा से फड़फड़ा रहा था।
खिड़की के बाहर खड़ा घुमंतू मुस्कराया।
“मंच पर तालियाँ बजाने वाले बहुत थे…
घर में हाथ बँटाने वाला कोई नहीं।”
- डॉ अंजना गर्ग , रोहतक
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कथा कहानी
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