काव्य :
स्मृतियों का स्पर्श
स्मृतियों का स्पर्श ..
पुनः हुआ है मन में आज,
कैसे बजती थीं संगीत तरंगें,
जीवन थिरकता था संग साज।
कोलाहल में भी थी शांति,
अलमस्त हम फिरा करते थे,
बातों में मशगूल, दुनिया से दूर,
सखी-सहेलियों संग घिरा करते थे।
सुध न रहती थी शाम की,
सखियों की ठिठोलियों में,
बारिश की बौछारों में झूमते,
कभी आँगन, कभी गलियों में।
सौंधी-सी महक आज फिर,
आँगन की मिट्टी से आई थी,
स्मृतियों के आँगन में खड़ी मैं,
आँखें मूँदे मुस्काई थी।
तभी एक तेज गड़गड़ाहट ने,
अचानक मेरी आँखें खोलीं,
बारिश की बूँदें टिप-टिप करतीं,
सूखे कपड़े उतारने को बोलीं।
स्मृतियों के स्पर्श से भीगी थीं आँखें,
कपड़े लाते-लाते वे भी धुल गईं,
गृहस्थी और जिम्मेदारियों में रँगी,
स्मृतियों का पिटारा वहीं भूल गई।
-श्रीमती अंजना दिलीप दास
बसना छत्तीसगढ़
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