काव्य :
सूर्य अचानक न उगे
खाड़ी का संकट
होर्मुज पर धमकी
बार पलटवार
मात्र जोश न होश
शून्य नहीं,
अणु परमाणु
स्थल भी बनते
केंद्र हमलों का
धैर्य विहीन
पक्ष कहूं विपक्ष,
आशंकित मैं
विश्व समग्र भी
सोंच मानवता की
आभास भयंकरता का
क्रान्ता हों आक्रान्ता,
कहीं अतीत के पन्ने
फिर न खुलें
लिटिल बाॅय
अचानक सूर्य हो
कलेवर बदलकर,
एक या अनेक
हिरोशिमा नागासाकी
कोई जन्म दे
पीढ़ियों की त्रासदी
फिर हिबाकुशा,
एक धमाका
इधर या उधर
भोगेगी मानवता
आक्रमण शान्ति पर
संभावित भविष्य पर,
हे ईश्वर!
समय अभी भी
आवश्यकता भी
सद्बुद्धि दे
इनको उनको,
पथ सुख शान्ति का
मन न भ्रान्ति का
कदम समृद्घि की ओर
बढ़ सकें
हे प्रभु बढ़ सकें।
- शशांक मिश्र भारती शाहजहांपुर उत्तर प्रदेश
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