महिला दिवस को समर्पित
काव्य :
अनेक रूपों में
जब तुम
थकान से आकुल-व्याकुल ,
पुकारते हो उसे -
शांति और सुकून की छाँह तलाशते,
अपेक्षित क्षुधा की तृप्ति के लिए ,
तब वह माँ बन जाती है-l
मन में उमड़ते संघर्षों -
विमर्शों के शमन हेतु,
चाहते हो कोई साथ,
वह मित्र बन तुम्हे संभालती है।
कभी बहन बन -तुम्हारे दुखों को ,
आँचल में संभालती ।
तुम्हारी मुस्कान बन जाती है।
अपने नन्हे हाथों से ,मचलती ,
गोद में आने की जिद करती -
बिटिया भी वही ,
दुनिया की भीड़ से अलग,
अपने मधुमय एकांत में -
पत्नी बन तुम्हे दुलारती नारी -
कदम से कदम मिलाती -
जिंदगी के ऊँचे-नीचे रास्तों पर ,
वह पत्नी,प्रिया,बहन,बेटी -
कितने रूपों में जीती है -एक साथ ,
स्वयं -सिद्धा बन कर .
-पद्मा मिश्रा,जमशेदपुर
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काव्य
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