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लोकनायक राम के आदर्श - पद्मा मिश्रा,जमशेदपुर


 

लोकनायक राम के आदर्श 

 - पद्मा मिश्रा,जमशेदपुर

        तुलसी के आदर्श राम लोकनायक थे, और लोकनायक वहीं हो सकता है जो समन्वय कर सके,,राम ने धर्म में समन्वय किया, सामाजिक वर्गों, जातियों में समन्वय किया, मानवीय मूल्यों और परंपराओं, संबंधों में भी समन्वय कर उन्होंने मर्यादा की एक नई राह बनाई,,

न्याय,धर्म, करुणा, और आदर की स्थापना की‌ थी, 

बचपन में तुलसी दास जी का नाम रामबोला रखा गया था, क्योंकि जन्म के समय उनके मुंह में बत्तीस दांत मौजूद थे और उनके मुख से पहला शब्द राम निकला था, जन्म लेते ही माता की मृत्यु हो गई और पिता आत्माराम ने मुनिया नामकी सेविका को इनके पालन पोषण के लिए सौंप दिया,, मुनिया के ममत्व में पले बढ़े, गुरु नरहरि दास से शिक्षित बालक तुलसी ने दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से विवाह किया, किंतु गृहस्थ जीवन से विलग हो कर अपना संपूर्ण जीवन राम कथा को समर्पित कर दिया,काशी के अस्सी घाट पर कुटिया बनाकर रामचरित मानस की रचना की, पंडितों का विरोध सहन किया और महादेव भगवान विश्वनाथ की कृपा से हर द्वंद, संघर्ष पर विजय भी पाई,रामचरितमानस की रचना ने हिंदी साहित्य और तत्कालीन समाज के लिए मार्गदर्शन का काम किया,

इधर कुछ वर्षों से भौतिकता वादी युग ने पश्चिम की बुराईयों को भी जगह दी है.जो हमारे नैतिक व् सांस्कृतिक पतन का कारण भी बन रही है.परिवार टूट रहे हैं ,एकल परिवारों की संख्या बड़ी है.फलस्वरूप जो अपसंस्कृति पनप रही है वह युवा पीढी के लिए घातक  सिद्ध हो रही है., अपनी भाषा, अपनी मर्यादा,  अपने नैतिक मूल्यों की अवहेलना करना ये सारी बातें भारतीय समाज के लिए गर्व का कारण नहीं हैं.सिनेमा ,मीडिया ,मुक्त चैनलों का प्रभाव सर्वर्त्र दिखाई दे रहा है. ......त्याग दीजिए घर, परिवार,मर्यादा,  प्रेम, निष्ठां कीपवित्र भावनाएं ओउर जंगलों में चले जाइये ,पर यह भी जान लें की एक संस्कृति विहीन समाज अधिक दिनों तक पनप नहीं सकता. हमारा परिवार समाज की एक इकाई है तो समाज सुधारने से पहले परिवार को सुधारें तभी सुसंस्कृत परिवारों का एक अनुशासित समाज बन सकेगा.राम चरित मानस में कौशल्या ने राम वन गमन के समय संबंधों की मर्यादा का सुन्दर पाठ राम को पढ़ाया था-''जो केवल पितु आयसु तांता*

                तो जनि जाहू जनि बड़ी  माता

           जो पितु मातु आयसु यह माना,

              तो कानन शत अवध समाना''

गोस्वामी तुलसीदास जी ने नारी ओर पुरुष दोनों को एक दूसरे  का समकक्ष मान कर एक दूसरे का पूरक बताया है. --''जिय बिनु देह नदी बिनु नारी,

                तैसी नाथ पुरुष बिनु नारी''

तुलसी के राम ने एक पत्नी व्रत के संकल्प के साथ इस अनुशासित जीवन के हर पल को जिया, उनके माध्यम से तुलसी ने यह संदेश दिया कि जिस प्रकार वारि के बिना नदी की कल्पना नहीं की जा सकती, वैसे ही पुरुष और नारी का एक समन्वित, रुप सदैव पूजित है समाज में, दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं,

राम के चरित्र का हर क्षण -जीवन का प्रत्येक कोना -संघर्ष ,जय  -पराजय,मानवीयता के प्रति समर्पण उन्हें आज भी जन-मानस में पूज्यनीय बनाता है --और पूजन भी कैसा ..जो ईश्वरत्व ,परमब्रह्म सा आदर ,गरिमा ,और वंदना का अधिकार भी प्रदान करता है ,राम नाम है संकट हरता का ,राम नाम है जीवन के भव सागर से मुक्ति दिलाने का ...राम नाम है मर्यादा का ,गरिमा का ,प्रेम और वात्सल्य का ,सम्बन्धों के  उच्चतमनिर्वहन और समर्पण का ..अकथनीय है उनकी जीवन कथा , ...हर युग में प्रासंगिक ,राम का चरित हर पीड़ित याचक के अंतर्मन  की एक कविता  है -- 

राम तुम्हारा चरित स्वयम ही काव्य है ''कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है*

-राम काचरित्र, जीवन, और आदर्श -समय की कसौटी पर परखे जाते रहे ..चुनौतियों का सामना करते रहे पर सामाजिक मर्यादा और सदाचरण की सुन्दर सीख  उन्हें भारतीय जन मानस और वांग्मय मेंअमर बना गई .मानवता  के प्रबल उन्नायक -शील -गुण,धीर -वीर राम केवल तुलसी के ही आदर्श नहीं थे ,पूरे समाज के भटके क़दमों को सही दिशा निर्देश देकर अधिकारों और कर्तव्यों की प्राप्ति और निर्वहन का एक नया लक्ष्य दिया जो तब भी समयोचित था और आज भी है. वास्तव में वाल्मीकि या तुलसीकृत रामकथा के मूल में ही जन-कल्याण की भावना निहित रही है .किसी कवि ने कहा है -

-''गीत तुलसी ने लिखे तो आरती सबकी उतारी ,

 ''राम का तो नाम है ,गाथा -कहानी है हमारी ''

-''उच्चतम आदर्शों की शुभ्र शिला पर अपने चरित्र की छाप छोड़ते और संस्कारधानी अयोध्या की उन्मुक्त गलियों में ,ऊंचे प्रसादों में खिलता -पलता राम का बचपन ,माता ,पिता के संस्कारों में परिवर्द्धित होता रहा और जब वन जाने का समय आया तो हंसते हंसते पिता कीआज्ञा शिरोधार्य कर वन की राह पकड़ ली, माताएं दुःख के सागर में डूब गईं पर पारिवारिक परम्पराओं और पुत्र के कर्तव्य से राम को विमुख नहीं होने दिया ----

ये थे राम के आदर्श .वन वन भटकते ,पत्नी व् भाई के साथ  दुर्गम पथ के कष्टों को सहन  करते हुए भी कभी विचलित नहीं हुए ,प्रो.शिव्कुमर शर्मा लिखते हैं --''तुलसी के राम में शील, भक्ति और सौन्दर्य का सुंदर ,समन्वय है,..तुलसीने राम जैसे पात्र का सृजन कर , मृतक हिन्दू राष्ट्र की धमनियों में रक्त का संचार किया है ''

राम का उद्देश्य ही था समाज का कल्याण -अपने आदर्श ,और कर्तव्यों के द्वारा उन्होंने लोकमंगल की भावना की स्थापना की थी .--परहित सरिस धरम नहिं भाई -पर पीड़ा सम नहीं अधमाई '' यही कारण  है कि  तुलसी का काव्य राम भक्ति से आप्लावित ऐसा सरोवर है ,जिसका अवगाहन कर सहृदय पाठक एक ओर तो अपने सामाजिक नैतिक नियमो को व्यवस्थित कर लेते हैं और दूसरी ओर अपने पारमार्थिक जीवन की सफलता का भी उद्घोष कर देते हैं .मुझे व्यक्तिगत रूप से मानस का वह प्रसंग अत्यंत प्रिय है जहाँ राम ने अपने मित्र सुग्रीव की मदद के लिए दुराचारी बाली का वध किया जिसने अपने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी तारा का बलपूर्वक हरण कर लिया था ,बाली उनसे पूछता है --मै वैरी सुग्रीव पियारा -कारन कवन नाथ मोहिं मारा ?''---तब राम का उत्तर मानवीय संबंधो की गरिमा को उसी ऊंचाई तक ले जाता है --''अनुज-बधू ,भगिनी सुत नारी,

                              सुनशठ ,कन्या सम ये चारी 

                              इनहिं कुदृष्टि विलोकत जोई

                               -ताहि बधै कछु पाप न होई ''.

.आज के युग में जहा सामाजिक सम्बन्ध तार तार हो रहे हैं ,नैतिकता का घोर पतन हो रहा है ,वहां आज से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व भी राम जैसे आदर्श चरित्र का निर्माण कर तुलसी ने समाज का पथ प्रदर्शन किया था .मित्र और मित्रता की परिभाषा राम के अतिरिक्त और कौन दे सकता है ?--''जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी,,,,,,''

जब राम राजा  बने ,तब पूरी अयोध्या ही उनका परिवार बन गई थी ,उनका दुःख राम का अपना दुःख था ,प्रजा का हित साधन करते समय यदि व्यक्तिगत  हित का त्याग करना पड़े तो वह जायज है .--''राम राज बैठे तिर्लोका ,हर्षित भयऊ  गयौ सब शोका 'राम जैसा राजा मिलना दुर्लभ था 'जिनकी घोषणा थी ---''जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी ,

सो नृप अवसि नरक अधिकारी ''..

आज के दौर में सत्ता का मद बड़े बड़ों को अँधा बना देता है वहीं राजा के रूप में राम ने प्रिय सीता का भी परित्याग करने में संकोच नहीं किया , निम्न वर्ग के नागरिक को भी न्याय मिला ,

वस्तुतः राम -कथा केवल कथा मात्र ही नहीं है --वह जीवन दर्पण भी है - ,जो समाज के भटके कदमों को सत्य का नया रूप दर्शाती है। राम की करुना  ,उनकेआदर्श ,बहुज्ञता  , भायप भक्ति ,माता  पिता का आदर ,आदर्श राज़ा की प्रजा वत्सलता ,मित्रता ,कितने ऐसे  पवित्र  गुण हैं जो उनके चरित्र की व्यापकता और उदारता को सर्वोच्चता प्रदान करते हैं ,जिनके दिव्य प्रकाश में हमारी भावी पीढियां अपना लक्ष्य निर्धारित कर सकती हैं ,--तुलसी दास जी का यह सुदीर्घ और  अनथक प्रयास  सचमुच स्तुत्य  और प्रशंसनीय है।  तुलसी  की रामकथा को जाति वर्ग ,धर्म ,संप्रदाय ,वाद -विवाद से कहीं ऊपर उठाकर आधुनिक जीवन शैली एवं जीवन मूल्यों के अनुरूप नए प्रतिमानों को स्थापित कर पाने का साधु प्रयत्न निश्चय ही सराहनीय है ,

--धन्य देश सो जहाँ सुरसरी -धन्य नारि पतिव्रत अनुसारी

धन्य सो भूप नीति जो कराइ -धन्य सो द्विज -निज धर्म न तरई ---अर्थात धन्य है वह देश जहाँ गंगाजी हैं ,वह स्त्री धन्य है जो पतिव्रता है ,वह राजा धन्य है जो न्याय करता है ,और वह  ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से नहीं डिगता --''

यहाँ पर तुलसी दास जी ने  राम के आदर्श चरित्र के माध्यम से धर्म को संकीर्णता -क्षुद्र बुद्धि से परे --रीति -नीति नियामक , प्रेम व् स्नेह बाँटने वाला , मानवता का पक्षधरऔर विशाल हृदय  बताया है जिसके आभ्यंतर में सारा  संसार समा सकता है। राजा ऐसा होना चाहिए जो प्रजा से पुत्रवत प्यार कर सके---ब्राह्मण का धर्म है -समाज कोसही मार्ग दिखाना, शिक्षित बनाना। .उसे  अपने  धर्म -अपने कर्तव्य का पालन करना ही चाहिए --यही उसकाआदर्श है ,

प्रायः समाज में राम चरित मानस ,बाइबिल,कुरानअथवा अन्य धार्मिक ग्रंथों कोसम्प्रदायवाद से जोड़ कर

 देखाजाता है,धार्मिक उन्माद व् द्वेष की भावना से प्रेरित होकर ''राम'' का नाम लेना भी जहाँ धार्मिक -सांप्रदायिक कुतर्कों को जन्म देता है वहीँ ''राम'' के चरित्र को -जीवन को ,समाज -हित में निरत  बताकर  आदर्श व् मर्यादा की नई परिभाषा गढ़ने की सुन्दरतम कोशिश है   तुलसी दास ने राम चरित मानस के माध्यम से,जीवन

के सारे विवाद ,,प्रश्न व् उलझनों का सुंदर समन्वय और समाधान भगवान शिव के माध्यम से प्रस्तुत किया है,--पूरी रामकथा  समाज को  एक अनूठे संकल्प में ढालती है ,शिव स्वयम विश्व कल्याण के देवता हैं अतः शिव को साक्षी बनाकर लिखी गई रामकथा-- के मूल में हमारे जन-मानस की ही कथा है --

मै नमन करती हूँ तुलसी को -जिन्होंने राम के आदर्शों को घर घर तक पहुँचाया ,नमन मर्यादा पुरुषोत्तम राम को ,जिनके आदर्श ,चरित्र की शुभ्रता आज भी प्रासंगिक है ,सत्य की स्थापना के लिए ,असत्य के विनाश और अधर्म को समूल नष्ट कर सुधर्म की स्थापना करने वाले प्रभु राम को मेरा शत शत प्रणाम --

             -''सत्य हारा नहीं आज तक शक्ति से ,

               नाश ,संहार ,संग्राम के सामने ,

                सिर झुकाना पड़ेगा परशुराम को ,

                शांति के देवता राम के सामने ''

  ---पद्मा मिश्रा--जमशेदपुर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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