काव्य :
धर्म, आस्था, विश्वास
*
कानूनों के घेरे में
धर्म ,आस्था और विश्वास,
खड़े आज ये,
सत्य के इस कटघरे में,
लगता जैसे,
ढूंँढ रहे ये अंतरमन में
सनातनी सी आस
सदियों से जो
हृदयप्रेम सा- श्वासों में
भरते रहे निज प्राण,
सोच रहे ये, आज खड़े-
कैसें माने?
कब क्यों और कैसे
होते हैं सब ये निष्प्राण,
मानवता की बने कसौटी
सदियों से जब ये
बने सारथी
पथ के बन ये अनुरागी ,
कृतसंकल्पों का
कर अनुमोदन, रहे साक्षी
सभी जिताई थी बाजी, आज प्रतिद्वंदी सा
समय देखता
कब और कैसे देकर साथ
त्रेता युग के
रावण का सा करें विनाश
जन मानस में
फूंक सको तुम फिर से
सनातनी
वही भैरवी शंख निनाद
जिससे गूंँज उठे
विगत पलों का
वही सुनहरा पावन
सा- इतिहास।
*
- श्यामा देवी गुप्ता दर्शना भोपाल
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