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शिक्षक, शोध और शिक्षा — सबका नया केंद्र बनेगी एनसीईआरटी - प्रो. आरके जैन “अरिजीत” शिक्षाविद् बड़वानी (मप्र)


 

शिक्षक, शोध और शिक्षा  — सबका नया केंद्र बनेगी एनसीईआरटी

[एनसीईआरटी अब किताबों की मेज से उठकर नीति की कुर्सी पर]

[एनसीईआरटी का डीम्ड यूनिवर्सिटी बनना क्यों है ऐतिहासिक फैसला]

      जब किसी देश की शिक्षा व्यवस्था करवट लेती है, तो बदलाव केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की दिशा और दशा दोनों बदल जाती हैं। भारत की शिक्षा यात्रा में 2026 का आरंभ ऐसा ही एक निर्णायक पड़ाव बन गया है। पिछले 6 दशकों से करोड़ों विद्यार्थियों को अपनी पुस्तकों के माध्यम से मार्ग दिखाने वाली एनसीईआरटी अब ‘डीम्ड-टू-बी-यूनिवर्सिटी’ बनने जा रही है। अब वह केवल किताबें तैयार करने वाली संस्था नहीं रहेगी, बल्कि डिग्री प्रदान करेगी, शोध को बढ़ावा देगी, नए शिक्षकों का निर्माण करेगी और शिक्षा की नई नीतियों की आधारशिला रखेगी। यह बदलाव महज एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था को भीतर तक बदल देने वाली उस ऐतिहासिक क्रांति की शुरुआत है, जिसकी नींव राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने रखी थी।

1961 में स्थापित एनसीईआरटी ने दशकों तक भारतीय विद्यालयी शिक्षा की आधारशिला बनकर कार्य किया। देश के अधिकांश स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकें, पाठ्यक्रम और मूल्यांकन पद्धतियां इसी संस्था की दृष्टि से आकार लेती रहीं। इसकी किताबों ने गांव के छोटे विद्यालय से लेकर महानगरों के प्रतिष्ठित स्कूलों तक शिक्षा का एक समान आधार तैयार किया। लेकिन समय बदलने के साथ यह स्पष्ट हो गया कि केवल पाठ्यपुस्तकें तैयार कर देना पर्याप्त नहीं है। नई शिक्षा व्यवस्था को ऐसे विशेषज्ञों की जरूरत है, जो शिक्षा को गहराई से समझें, उस पर शोध करें और बदलते समय के अनुसार उसे नया स्वरूप दे सकें। यही सोच एनसीईआरटी को विद्यालयी शिक्षा की सीमाओं से आगे बढ़ाकर उच्च शिक्षा के केंद्र में ले आई।

वर्ष 2023 में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पहली बार सार्वजनिक रूप से संकेत दिया था कि एनसीईआरटी को शोध और शिक्षक शिक्षा का राष्ट्रीय केंद्र बनाया जाएगा। लगभग 3 वर्षों की तैयारी, विशेषज्ञों की सिफारिशों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बाद अब यह निर्णय अंतिम रूप लेने जा रहा है। दिल्ली स्थित एनसीईआरटी मुख्यालय के साथ-साथ अजमेर, भोपाल, भुवनेश्वर, मैसूर और शिलांग के क्षेत्रीय संस्थान भी इस नए स्वरूप का हिस्सा बनेंगे। इसका अर्थ केवल इतना नहीं कि एनसीईआरटी का दायरा बढ़ेगा, बल्कि यह कि देश के अलग-अलग हिस्सों में शिक्षा और शोध के नए केंद्र उभरेंगे। पहली बार विद्यालयी शिक्षा और विश्वविद्यालयी शोध एक ही मंच पर साथ दिखाई देंगे।

डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा मिलने के बाद एनसीईआरटी को व्यापक शैक्षणिक अधिकार प्राप्त हो जाएंगे। अब वह स्वतंत्र रूप से डिप्लोमा, स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी स्तर तक के पाठ्यक्रम संचालित कर सकेगा। शिक्षा, मनोविज्ञान, बाल विकास, समावेशी शिक्षा, डिजिटल शिक्षण, बहुभाषी अध्ययन और शिक्षक-प्रशिक्षण जैसे विषयों में विशेष डिग्रियां दी जा सकेंगी। संस्था को अपने पाठ्यक्रम स्वयं बनाने, शैक्षणिक ऋण बैंक प्रणाली लागू करने और राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग ढांचे में शामिल होने की स्वतंत्रता मिलेगी। इसके साथ ही विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ साझेदारी, छात्र-शिक्षक आदान-प्रदान तथा नए परिसर खोलने का मार्ग भी प्रशस्त होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एनसीईआरटी का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता को नई ऊंचाई तक पहुंचाना होगा।

दशकों से भारतीय शिक्षा व्यवस्था दो हिस्सों में बंटी हुई दिखाई देती रही है—एक ओर स्कूल, दूसरी ओर विश्वविद्यालय। विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली सामग्री और विश्वविद्यालयों में होने वाला शोध शायद ही कभी एक-दूसरे से जुड़ पाए। परिणामस्वरूप शोध पुस्तकालयों और रिपोर्टों तक सीमित रह गया, जबकि स्कूल पुराने ढर्रे पर चलते रहे। एनसीईआरटी का यह नया रूप अब इस दूरी को समाप्त करने वाला सशक्त सेतु बनेगा। जो विशेषज्ञ पाठ्यक्रम तैयार करेंगे, वही शिक्षक गढ़ेंगे और वही शिक्षा पर शोध भी करेंगे। इससे नई खोजें और नए विचार सीधे कक्षा तक पहुंचेंगे। बच्चों की पढ़ाई अधिक व्यावहारिक, वैज्ञानिक और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप बन सकेगी।

भारत की शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हमेशा से प्रशिक्षित और सक्षम शिक्षकों की कमी रही है। अनेक शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान आज भी पुराने पाठ्यक्रमों और पारंपरिक तरीकों तक सीमित हैं। ऐसे समय में एनसीईआरटी का यह नया स्वरूप शिक्षक-शिक्षा के क्षेत्र में नई क्रांति ला सकता है। अब वह ऐसे पाठ्यक्रम प्रारंभ कर सकेगा, जिनमें डिजिटल शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित शिक्षण, व्यावसायिक शिक्षा, समावेशी कक्षाएं और बहुभाषी अध्ययन जैसे आधुनिक विषय शामिल होंगे। क्षेत्रीय संस्थानों में पीजी और पीएचडी कार्यक्रम शुरू होने से युवा शोधकर्ताओं को विद्यालयी शिक्षा की वास्तविक चुनौतियों पर काम करने का अवसर मिलेगा। उनके शोध के परिणाम सीधे पाठ्यपुस्तकों और शिक्षा नीतियों में दिखाई देंगे, जिससे शिक्षा अधिक जीवंत, प्रभावी और समयानुकूल बन सकेगी।

हर बड़ा परिवर्तन अपने साथ चुनौतियां भी लाता है। एनसीईआरटी के सामने भी कई गंभीर प्रश्न हैं। कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि यूजीसी के नियमों के अधीन आने से उसकी स्वतंत्र कार्यशैली प्रभावित हो सकती है। जिस संस्था की पहचान अब तक विद्यालयी शिक्षा से रही है, उसके लिए विश्वविद्यालयी ढांचे में ढलना आसान नहीं होगा। नए विभाग, प्रशिक्षित संकाय, शोध सुविधाएं, पर्याप्त बजट और प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता पड़ेगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उच्च शिक्षा की नई भूमिका निभाते हुए एनसीईआरटी अपनी मूल जिम्मेदारी, यानी स्कूल शिक्षा को मजबूत बनाने, से दूर न हो। यदि योजना, पारदर्शिता और गुणवत्ता पर बराबर ध्यान दिया गया, तो यही चुनौतियां उसकी सबसे बड़ी शक्ति बन सकती हैं।

यदि यह परिवर्तन सफल हुआ, तो आने वाले समय में एनसीईआरटी केवल एक संस्था नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र बन जाएगी। एक ओर देश का विद्यार्थी उसकी किताबों से पढ़ेगा, दूसरी ओर उसी संस्था का शोधकर्ता नई शिक्षा नीति तैयार करेगा और वही शिक्षक गढ़े जाएंगे, जो आने वाली पीढ़ियों को दिशा देंगे। यह ऐसा मॉडल होगा, जहां शिक्षा, शोध और प्रशिक्षण एक-दूसरे से सीधे जुड़े होंगे। विकसित भारत का सपना केवल उद्योग, तकनीक और अर्थव्यवस्था से पूरा नहीं होगा; उसकी सबसे मजबूत आधारशिला शिक्षा ही बनेगी। एनसीईआरटी का यह नया स्वरूप उसी आधारशिला को अधिक मजबूत, व्यापक और विश्वस्तरीय बनाने की दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम है।


 - प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

शिक्षाविद्

बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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