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लघुकथा : मैग्मा की रसीद - विभा रानी श्रीवास्तव, पटना


 

लघुकथा : 

मैग्मा की रसीद

    “आज का साहित्य चरित्रहीनों का होता जा रहा है।” वार्षिकोत्सव की साहित्यिक गोष्ठी अपने अन्तिम पायदान पर थी। मंच पर बैठे वरिष्ठ साहित्यकारों के बीच हो रही परिचर्चा में बहस छिड़ी हुई थी— और नीचे बैठी साहित्यिक श्रोताओं की भीड़ में मेधा चुपचाप सब सुन रही थी। अभी-अभी उसे अपने लिखे उपन्यास के लिए प्रतिष्ठित साहित्य पुरस्कार मिला था। लेकिन बधाइयों से ज्यादा उसके कानों में फुसफुसाहटें पड़ रही थीं—

“समझ रहे हो न, कैसे मिला होगा पुरस्कार…”

“अकेली औरत इतनी जल्दी ऐसे कहाँ पहुँचती है…”

“आजकल स्त्रियाँ खुद अपने चरित्र का पतन कर रही हैं, तभी समाज बिगड़ रहा है।” मंच पर बैठे एक वरिष्ठ कवि ने उदाहरण देते हुए कहा— मेधा का साथ उसके धैर्य ने छोड़ दिया। वह उठी और बिना बुलाए ही मंच की ओर बढ़ गई। हॉल में सन्नाटा छा गया। “क्या मैं कुछ कह सकती हूँ?” उसने माइक थामते हुए पूछा।

“चारित्रिक पतन सिर्फ़ स्त्रियों के लिए ही क्यों कहा जाता है? अगर कोई स्त्री वैश्या बनती है, तो क्या पुरुष सहभागी नहीं होता? जो स्त्री को मैला कहकर खुद को साफ़ घोषित कर देते हैं, वे आखिर किस आईने में खुद को देखते हैं?” अनुमति की प्रतीक्षा किए बिना ही वह बोल भी पड़ी— भीड़ में हलचल हुई। मंच पर बैठे चेहरे असहज हो उठे।

“गाँव में भीड़ द्वारा स्त्रियाँ प्रताड़ित की जाती हैं, तो उसके चरित्र को मोहरा बनाया जाता है, कार्यालय में किसी स्त्री को पदोन्नति मिल जाए, तो उसकी मेहनत नहीं, उसके चरित्र पर सवाल उठते हैं। और हद तो यह है कि साहित्य—जो समाज को दिशा देने वाला कहलाता है—वहाँ भी इस सोच से अछूते मनुष्य नहीं हैं।” मेधा ने आगे कहा— अब उसकी आवाज़ और गम्भीर हो गई थी—

“दोष अगर है, तो आईने का नहीं, देखने वाली नज़रों का है। लेकिन यहाँ तो आधा आईना ही धुंधला कर दिया जाता है… ताकि धब्बे सिर्फ़ स्त्री के चेहरे पर दिखें।” सभागार कुछ पल के लिए बिल्कुल शान्त हो गया। फिर पीछे की पंक्ति से एक महिला खड़ी हुई और उसने ताली बजाई। उसके बाद दूसरी, फिर तीसरी… देखते ही देखते पूरा हॉल तालियों से गूँज ज उठा। मंच पर बैठे वही वरिष्ठ कवि धीरे से अपना चेहरा झुका चुके थे। शायद पहली बार उन्हें एहसास हुआ था— कि चरित्र का दर्पण किसी एक लिंग का नहीं होता।

मेधा के मन में उठे तूफ़ान और उसके द्वारा की गई बेबाक बात ने सभा को स्तब्ध कर दिया था। उस शाम, जब वह स्मृति-चिह्न लेकर घर लौट रही थी, उसने एक पुराने, जर्जर काठ के पुल पर रुकना चाहा।

शाम गहरा रही थी, और वातावरण में धुंध सी छा गई थी। मेधा पुल के किनारे, काठ के जंगले पर टेक लगाकर बैठ गई। वह हताश और अकेली महसूस कर रही थी। चारों ओर सूखी पत्तियों का ढेर था, जो उसके मन की सूखी उम्मीदों की तरह बिखरा था। पुल के परे, पेड़-पौधों से भरी धुंधली और उदास दुनिया दिख रही थी। अचानक, उसकी नज़र दूर, धुंध में उड़ते हुए पक्षियों पर पड़ी। वे काली, परछाइयों की तरह लग रहे थे, एक समूह में, मुक्त और निर्भीक। वे उस धुंध को चीरते हुए, किसी अनदेखी दिशा में उड़ रहे थे। मेधा ने उन्हें देखते हुए एक गहरी साँस ली। "मैं भी तो इन पक्षियों की तरह हूँ। पितृसत्तात्मक धुंध को चीर कर, अपनी स्वतंत्र पहचान और अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ रही हूँ। सभा में मैंने जो बात रखी, वह बिलकुल सही थी। अपनी मेहनत और प्रतिभा के लिए सम्मान की मांग ही तो रखी थी।" बुदबुदाते हुए उसने अपनी स्मृति-चिह्न को ध्यान से देखा, जो अब उसके हाथ में एक मशाल की तरह लग रही थी।


—विभा रानी श्रीवास्तव, पटना

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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