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सरोकार : 10 साल में 94 हजार सरकारी स्कूल हुए बंद - डॉ. चन्दर सोनाने, उज्जैन


 

सरोकार :

10 साल में 94 हजार सरकारी स्कूल हुए बंद

          - डॉ. चन्दर सोनाने, उज्जैन

                         हाल ही में एक दुखद खबर आई है। वो खबर यह है कि देश में पिछले एक दशक में 93,779 सरकारी स्कूल बंद हो गए है। वर्ष 2014-2015 में देश में 11,07,101 सरकारी स्कूल चल रहे थे, ये सरकारी स्कूल साल 2024-25 में घटकर 10,13,322 रह गए। आश्चर्यजनक बात यह है कि इसी अवधि में निजी क्षेत्र में 51,419 स्कूल नए खुल गए। 

  उक्त जानकारी किसी प्रायवेट संस्था द्वारा किए गए सर्वे का परिणाम नहीं है, बल्कि केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में दी गई। वर्ष 2014-15 में देश की आबादी करीब 130.9 करोड़ थी। उस समय देश में कुल स्कूल 11,07,101 थे। इन स्कूलों में 14,40,81,075 छात्रों का नामांकन हुआ था। इस प्रकार 93,779 स्कूल बंद हो गए। साल 2024-25 में देश की आबादी लगभग 146.3 करोड़ थी। इस समय देश में कुल स्कूल 10,13,322 रह गए और छात्रों का नामांकन भी घटकर 12,15,89,911 हो गया। इस प्रकार 10 साल के दौरान छात्रों के नामांकन में 2,24,91,164 गिरावट आ गई। यानी करीब सवा दो करोड़ से अधिक छात्र सरकारी स्कूल में पढ़ने से वंचित रह गए। 

मजेदार बात यह है कि पिछले 10 सालों में देश में कुल प्रायवेट स्कूल 51419 बढ़ गए। वर्ष 2014-15 में कुल प्रायवेट स्कूल देशभर में 2,88,164 थे। वर्ष 2024-25 में निजी स्कूल बढ़कर 3,39,583 हो गए। नामांकन में भी आश्चर्यजनक बढ़ोत्तरी हो गई। वर्ष 2014-15 में इन निजी स्कूलों में छात्रों का नामांकन 8,46,42,241 थे, जो वर्ष 2024-25 में बढ़कर 9,58,56,710 हो गए। इस प्रकार आश्चर्यजनक रूप से पिछले एक दशक में निजी स्कूलों में 1,12,14,469 नामांकन बढ़ गए। 

सरकारी स्कूल बंद होने की प्रवृत्ति उत्तरी और पूर्वी राज्यों में ज्यादा है। दक्षिण राज्यों में अपेक्षाकृत कम स्कूल बंद हो रहे हैं। जैसे कि मध्यप्रदेश में पिछले एक दशक में करीब 30 हजार स्कूल बंद हुए हैं। वहीं उत्तरप्रदेश में करीब 25 हजार सरकारी स्कूल बंद हो गए। किन्तु तमिलनाडु में इस दौरान 285 सरकारी स्कूल ही बंद हुए। इसी प्रकार केरल में भी उक्त अवधि में केवल 296 सरकारी स्कूल ही बंद हुए। 

  केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा दिए गए आँकड़े चिंताजनक है। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को चाहिए कि बंद हो रहे सरकारी स्कूलों के कारणों की पड़ताल करें और जो कमियाँ आए उसे दूर करने का प्रयास करें। यह सर्वज्ञात सत्य है कि सरकारी स्कूलों में गरीब परिवारों के बच्चे ही पढ़ते हैं। इसलिए बंद हो रहे स्कूल के कारण सीधा प्रभाव गरीब परिवारों के बच्चों पर ही पड़ता है। हजारों- लाखों बच्चे शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। 

मध्यप्रदेश में हाल ही में 1 अप्रैल से सरकारी स्कूलों में बच्चों के प्रवेश का उत्सव मनाया जा रहा है। पहले दिन स्कूल आने वाले बच्चों को तिलक लगाकर उनका स्वागत किया जा रहा है। सरकार की यह पहल अच्छी है। किन्तु उन्हें यह सोचना चाहिए कि रोज क्यों बंद हो रहे हैं स्कूल ? बंद हो रहे स्कूल के बच्चे शिक्षा से वंचित क्यों हो रहे है ? 

                       संविधान के अनुसार बच्चों को 8 वीं तक शिक्षा प्राप्त करना उनका मूलभूत अधिकार है। इस प्रकार सीधा-सीधा बच्चों के अधिकारों का हनन हो रहा है। इसे प्राथमिकता से रोका जाना चाहिए। केन्द्र और राज्य सरकार को चाहिए कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में बंद हुए सरकारी स्कूलों के कारणों का पता लगाएँ। और उन कारणों को प्राथमिकता से दूर करंे। देश में अनेक सरकारी प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं, जिसमें कक्षा 1 से 5 वीं तक एक ही शिक्षक सभी विषय पढ़ा रहा है। अभी भी कई स्कूल झोपड़ी में या पेड़ के नीचे लग रहे हैं। 

                       भवनविहीन स्कूल के दो उदाहरण ही दिये जाने काफी होंगे। मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के आस्टा विकासखंड के ग्राम हरजीपुरा में शासकीय प्रायमरी स्कूल में प्रवेश उत्सव के पहले दिन ही बच्चे खुले आसमान के नीचे धूप में नीम के पेड़ के नीचे पढ़ाई करने को मजबूर हैं। इसी प्रकार संभल में एक प्राथमिक स्कूल ऐसा है, जहां पेड़ के नीचे बैठकर बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। जर्जर भवन होने के चलते लगभग 1 वर्ष पहले उसे ध्वस्त कर दिया गया था। मामला उत्तरप्रदेश के संभल के ब्लॉक पंवासा के गांव सिकंदरपुर करछली का है। बीते एक वर्ष से सरकारी विद्यालय का भवन न होने से छात्र-छात्राएं एक पेड़ के नीचे बैठकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, जिससे स्कूल में पंजीकृत बच्चों में से भी कम बच्चे शिक्षा ग्रहण करने आ रहे हैं। 

                       कई स्कूल ऐसे भी हैं, जिसमें एक भी शिक्षक नहीं है। यानी शिक्षकविहीन स्कूल हैं। ऐसे स्कूलों के बच्चों का भविष्य भगवान भरोसे है। स्कूलों में छात्र और छात्राओं के लिए शौचालय की पृथक-पृथक व्यवस्था करना भी आवश्यक है। इसके साथ ही मूलभूत सुविधाएं भी स्कूलों को उपलब्ध कराना उतना ही जरूरी है। सरकारी स्कूलों की कमियों को जब तक दूर नहीं किया जायेगा, तब तक ऐसा ही चलता रहेगा। इसमें कोई बदलाव नहीं आने वाला। बदलाव के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति जरूरी है। और आज इसी की सबसे ज्यादा जरूरत है। 

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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