लघुकथा का 'एक ही समय काल' नियम: अभिव्यक्ति की बेड़ियाँ या आवश्यक संक्षिप्तता?
- विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल
लघुकथा हिंदी साहित्य की एक संक्षिप्त विधा है, जो क्षणिक घटना पर आधारित प्रभावशाली कथन प्रस्तुत करती है। इसके मूल नियमों में 'एक ही समय काल की घटना' प्रमुख है, यानी कथा पूर्णतः एक ही क्षण या संकीर्ण समयावधि में समाहित हो। यह नियम प्रेमचंद काल के बाद के लघुकथाकारों शिवप्रसाद सिंह आदि के द्वारा प्रतिपादित हुआ, जो लघुकथा को उपकथा या लघु कहानी से अलग करने का प्रयास था।
लेकिन क्या यह नियम लघुकथा की अभिव्यक्ति क्षमता को अनावश्यक रूप से सीमित नहीं करता? यह प्रश्न आज प्रासंगिक है, क्योंकि यह विधा की गतिशीलता को बाँध देता है।
नियम की जड़ें और औचित्य ..
लघुकथा को 'क्षण-कथा' ' कहा जाता है, जहाँ उद्देश्य पाठक पर तत्काल प्रभाव छोड़ना है। एक ही समय काल का नियम अनावश्यक विस्तार रोकता है, पात्रों की संख्या सीमित रखता है और अंत को तीक्ष्ण बनाता है।
संक्षिप्तता ही लघुकथा को शक्तिशाली बनाती है। तात्कालिकता के नियम का औचित्य यही है , लघुकथा लंबी कहानी का संक्षिप्त संस्करण न हो, बल्कि स्वतंत्र विधा बने।
अभिव्यक्ति क्षमता पर समय सीमाबद्धता
का नियम लघुकथा की अभिव्यक्ति को कृत्रिम रूप से बाँधता है। वास्तविक जीवन में कोई घटना शून्य काल में नहीं घटती । कारण-परिणाम की श्रृंखला घटना के समय को फैलाती है। एक ही समय काल थोपने से जटिल सामाजिक मनोवैज्ञानिक मुद्दे इस विधा में व्यक्त नहीं हो पाते। अंतिम रूप से व्यंग्य, जो लघुकथा का मूल ट्विस्ट है, अक्सर ऐतिहासिक या सांस्कृतिक संदर्भ माँगता है, जो एक क्षण में समेटना संभव नहीं होता है।
एक काल्पनिक लघुकथा की चर्चा करें। मान लीजिए, एक आल्हा गायक गांव में आता है। यदि नियम पालन करें , तो "गायक ने तार छेड़ा। श्रोता चुप। एक सांड, भीड़ में घुस आया , अचानक भगदड़ मच गई। गायक भागा।"
लेकिन यदि हल्का समय विस्तार अनुमत हो , गायक का आगमन, गायन और सांड वाली घटना का संदर्भ , थोड़ी चर्चा परिदृश्य पर , तो प्रभाव गहरा हो सकता है।
एक और उदाहरण लें, समकालीन मुद्दा, जैसे भोपाल गैस त्रासदी पर लिखें तो , एक ही समय में 'पीड़ित का दर्द' दिखाना संभव नहीं , वह लंबी श्रृंखला रही है।
है से थी का सफर ।
कुछ आधुनिक लघुकथाकार इस समय सीमा का उल्लंघन करते हुए लघुकथा लिख भी रहे हैं।
यह नियम तोड़ने से विधा 'फ्लैश फिक्शन' की वैश्विक धारा से जुड़ सकती है, जहाँ समय काल का लचीलापन स्वीकार्य है।
संतुलन की आवश्यकता..
निश्चित ही यह नियम लघुकथा को 'चुटकुला' बनने से बचाता है, लेकिन मेरी समझ में यह रचनात्मकता को कुंठित करता है। आलोचक विष्णु प्रभाकर ने कहा था कि लघुकथा 'संक्षिप्तता' है, न कि 'काल-सीमा'। यदि नियम कठोर रहे, तो विधा अप्रासंगिक हो जाएगी, जैसे ताजा समाचारों पर आधारित कथाएँ जो शीघ्र पुरानी पड़ जाती हैं।
समाधान यह है कि 'प्रमुख घटना एक काल में' का लचीलापन स्वीकार किया जाए । इससे अभिव्यक्ति विस्तृत होगी, व्यंग्य गहरा होगा , और यह बिना कथा विस्तार के जाल में फँसे , संभव है।
लघुकथा को मुक्त करने का समय आ चुका है,आखिर यह कोई अंतिम कानूनी नियम नहीं , केवल साहित्यिक मान्यता ही है। लघुकथा कारो का दायित्व है कि विधा को व्यापक बनाया जाए ताकि यह साहित्य को समृद्ध और जीवंत करे। अन्यथा, यह नियम बाध्यता लघुकथा को हमारी ही बनाई बेड़ियों में सीमित बना कर व्यर्थ ही बांध रहा है।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
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