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नशे से विनाश तक: मादक द्रव्यों के दुष्परिणाम और बचाव के उपाय - डाॅ०राकेश सक्सेना,एटा


नशे से विनाश तक: मादक द्रव्यों के दुष्परिणाम और बचाव के उपाय

   -  डाॅ०राकेश सक्सेना,एटा

     मानव सभ्यता विकास क्रम में अनगिनत समस्याओं के साथ मादक द्रव्यों का दुरुपयोग और उनका अवैध व्यापार आज समाज व विश्व समुदाय के लिए एक प्रमुख समस्या बन चुका है। मादक द्रव्यों के दुरुपयोग से तात्पर्य शराब, ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थों के अत्यधिक सेवन से है। यह युवाओं और समाज को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से खोखला कर रहा है। व्यक्तिगत स्तर पर इसका सेवन स्नायुतंत्र को प्रभावित करके मानसिक रोगों को जन्म देता है तो वहीं  सामाजिक स्तर पर यह व्यसन असमाजिक व्यवहार के लिए प्रेरित करता है। विगत दशकों में मादक द्रव्य का गैर कानूनी स्तेमाल होने लगा है, विश्व के अनेक देश इसकी चपेट में आ गए हैं, इसलिए यह वैश्विक समस्या बन चुकी है। मादक पदार्थों के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय दिवस हर वर्ष 26 जून को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 07 दिसम्बर 1987 ई० को प्रस्ताव के माध्यम से इस दिवस को स्थापित किया था। इसका मुख्य उद्देश्य अवैध नशों की चुनौतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाना, कलंक को मिटाना और एक नशामुक्त समाज का निर्माण करना है।
        शराब, तम्बाकू, गांजा, भाँग, अफीम, हेरोइन, कोकीन, सिंथेटिक ड्रग्स, नींद की गोलियाँ, इनहेलेन्टस आदि अनेक प्रकार के नशे प्राय: युवा अपने साथियों के दबाव में आकर प्रारम्भ कर देते हैं। आधुनिक जीवन शैली में मादक द्रव्य को प्रतिष्ठा का प्रतीक समझा जाने लगा है। घर में कलह, उपेक्षा, अवसाद, चिंता, असफलाएँ व्यक्ति को नशे की ओर प्रेरित करतीं हैं। इन पदार्थों के अवैध व्यापार व तस्करी से सहज उपलब्धता ने इस समस्या को और भी अधिक गम्भीर बना दिया है। इनका सेवन करने के कारण अनेक दुष्प्रभाव देखने में आते हैं। व्यसनी के शरीर में हृदय रोग, कैंसर, फेफड़ों की बीमारी, लिवर की क्षति, एचआईबी, हिपेटाइटिस, मस्तिष्क की कार्यक्षमता में कमी आ जाती है। मानसिक दृष्टि से अवसाद, चिड़चिड़ापन, स्मरणशक्ति का ह्रास, आत्मविश्वास में कमी आ जाती है। पारिवारिक विघटन, घरेलू हिंसा, सामाजिक प्रतिष्ठा, शिक्षा व रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। नशे का आदी व्यक्ति अपनी आय का बड़ा भाग मादक पदार्थों पर व्यय करता है। युवाओं में नशे के प्रभाव से पढ़ाई में अरुचि, अनुशासनहीनता, हिंसक प्रवृत्ति, भविष्य के प्रति निराशा जैसी समस्याएँ देखने को मिलतीं हैं। नशे की लत पारिवारिक वातावरण को तनावपूर्ण बनाती है, पति-पत्नी में तनाव रहता है, बच्चों का पालन- पोषण प्रभावित होता है, आर्थिक संकट गहराता है।
       मादक पदार्थों की तस्करी विश्व के सबसै बड़े अवैध व्यवसायों में से एक है जो सीमा सुरक्षा के लिए खतरा बनता है, आतंकवाद को वित्तीय सहायता देता है, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के साथ संगठित अपराधों को प्रोत्साहित करता है। भारत सरकार ने नारकोटिक ड्रग्स एण्ड साइकोट्रापिक सब्सटेंस अधिनियम, 1985 कानून बनाकर मादक पदार्थों के उत्पादन, भण्डारण एवं व्यापार को नियंत्रित करने का प्रयास किया है। देश भर में सरकारी व गैर सरकारी नशामुक्ति केन्द्र कार्य कर रहे हैं, नशे की रोकथाम, उपचार और सामाजिक पुनर्वास के लिए अनेक योजनाएँ संचालित हैं फिर भी इसकी रोकथाम के लिए परिवार को व्यसनी के साथ संवाद बनाए रखने एवं सकारात्मक वातावरण प्रदान करने, नशे के दुष्परिणामों के विषय में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने, खेल, साहित्य, संगीत, योग, सामाजिक गतिविधियों से जोड़ने एवं अवैध व्यापार पर कठोर कार्यवाही करने की आवश्यकता है। युवाओं को भी चाहिए कि नशे से दूर रहने का संकल्प लें, नशामुक्त समाज निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँ।
       निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि नशा क्षणिक सुख का भ्रम है किन्तु इसका परिणाम विनाश है, जिससे व्यक्ति, समाज व राष्ट्र को ही हानि होती है। अत: यह समस्या स्वास्थ्य तक सीमित न होकर सामाजिक, आर्थिक, नैतिक व राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी समस्या है। इसके समाधान हेतु सरकारी कानूनों के साथ-साथ परिवार, समाज, शिक्षा एवं युवाओं को संगठित होकर कार्य करना होगा।
                        
- डाॅ०राकेश सक्सेना, 
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 
68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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