काव्य :
क्या स्वर्ग इसी को कहते हैं
उच्च, श्वेत,निर्मल हिम शिखर
खड़े है सीना, तान,उधर
प्रहरी सीमाओं के वे
कर्तव्य रत हैं वे,आठों पहर
हरीतिमा ढके हुए,परबत
रखते हैं नजर,है कौन किधर
देश में बैठे हुए ,हर जन
हैं सुरक्षित,इनसे ही, बेफिकर
ये हिमालय परबत, हमारी आन है
देश का नाज, ये, हमारी शान है
सुंदरतम, यहां का दृश्य है
गर्वित देश के,सभी,मनुष्य हैं
बादल, लोलुप,से दिखें यहां
उतर कर घाटी में,सैर करते हैं
नदिया सा, बहते है ,पहाड़ों बीच
ब्रज,क्या स्वर्ग इसी को कहते हैं
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र , भोपाल
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