कहानी :
चक्रव्यूह
- विवेक रंजन श्रीवास्तव ,भोपाल
शाम के छह बज रहे थे। लंदन की खिड़की के बाहर धुंधली रोशनी फैल रही थी, लेकिन हरीश की मेज पर सन्नाटा था। उसके सामने खुला लैपटॉप किसी खुली तिजोरी की तरह लग रहा था, जिसके भीतर उसने अपनी साल भर की मेहनत—अपनी कमाई, अपने खर्च और अपने निवेश—को एक फाइल में समेट रखा था।
फोन की घंटी बजी। टैक्स सलाहकार की आवाज़ में वह व्यावसायिक निश्चिंतता थी जो केवल उन लोगों में होती है, जिनकी गर्दन फँसने वाली नहीं होती। "सर, सब तैयार है। बस वो ओटीपी दे दीजिए, सबमिट कर दूँ?"
हरीश ने ओटीपी बताया। स्क्रीन पर 'रिटर्न फाइल सक्सेसफुल' का मैसेज चमक उठा। वकील साहब की फीस खाते से कट गई—उन्होंने फीस तो ली थी, लेकिन वह जिम्मेदारी की पूरी गठरी, जिसे वे बड़ी सहजता से उतारकर हरीश के सिर पर रख गए थे, अब भी वहीं थी। कागजों पर वकील का नाम तक नहीं था; वह बस एक अदृश्य कड़ी थे।
हरीश ने कुर्सी पीछे धकेली। सुबह का एक दृश्य उसे याद आया—बाजार में उसने ग्रॉसरी ली थी। दुकानदार ने बिल दिया, उसने भुगतान किया और बात खत्म हो गई। कितना सीधा और पारदर्शी था वह लेन-देन। पर यहाँ? यहाँ सब कुछ उलटा था।
"क्या मैं पागल हूँ?" उसने खुद से पूछा। "मैं ही अपना बिल बना रहा हूँ, मैं ही खुद पर कर निर्धारित कर रहा हूँ, और मैं ही खुद को सरकार के सामने 'ईमानदार' साबित करने के लिए दस्तावेज पेश कर रहा हूँ।"
उसके पास सारे सबूत थे, बैंक स्टेटमेंट थे, फिर भी उसके मन में एक अनजाना डर था। उसे पता था कि इस तंत्र में 'ईमानदारी' कोई प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि एक 'संदेह' है। कल को कोई नोटिस आ सकता है, केस रिओपन हो सकता है। तब उसे फिर साबित करना होगा कि उसकी कमाई का हर पैसा सफेद था। वह खुद ही अपने खिलाफ गवाह बनेगा, खुद ही वकील बनेगा, और खुद ही उस अदृश्य जज के सामने अपनी सफाई पेश करेगा।
उसने फिर खिड़की से बाहर देखा। बाहर की दुनिया में नियम स्पष्ट और ठोस थे, लेकिन यहाँ वह एक ऐसा अभिनेता था जो अपनी ही टैक्स की पटकथा खुद लिख रहा था, खुद मंच पर अभिनय कर रहा था और अंत में खुद ही अपनी भूमिका पर शक कर रहा था।
मेज पर पड़ा वह लैपटॉप अब उसे एक यंत्र की तरह लग रहा था। हरीश ने महसूस किया कि यह केवल टैक्स फाइल करने की प्रक्रिया नहीं है; यह एक ऐसा चक्रव्यूह है, जिसमें प्रवेश तो उसने पूरी ईमानदारी के साथ किया था, पर जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। जब तक वह अपनी कमाई का हिसाब दे रहा था, तब तक उसे लगा कि वह अपनी स्वतंत्रता के छोटे-छोटे हिस्से इसी चक्रव्यूह की वेदी पर बलि चढ़ा रहा है—एक ऐसी बलि, जो उसकी अपनी ही कमाई की स्याही से लिखी जा रही थी।
अगले साल के नए ओटीपी तक, उसका जीवन अब इसी चक्रव्यूह का एक हिस्सा था।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
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कथा कहानी
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