शब्द नहीं, सँभाले हुए सच: भारतीय संवादों में मृत्युबोध और जीवन का उल्लास
बातचीत में बोले जाने वाले शब्द केवल संदेश पहुँचाने का माध्यम नहीं होते; वे हमारी सामूहिक चेतना, सांस्कृतिक स्मृतियों और सदियों पुराने जीवन-दर्शन के जीवंत वाहक भी होते हैं। भारतीय संस्कृति की सबसे अनूठी विशेषताओं में से एक यह रही है कि यहाँ अध्यात्म और जीवन के गहरे सत्य केवल ग्रंथों के पन्नों या हिमालय की गुफाओं में तप करते संतों तक सीमित नहीं रहे। वे घर-आँगन में, चौपालों पर, दादी-नानी की कहानियों में और बुज़ुर्गों की सहज बातचीत में उतनी ही स्वाभाविकता से प्रवाहित होते रहे हैं।
हमारे दादा-दादी, नाना-नानी और गाँव-समाज के बुज़ुर्ग अक्सर ऐसी सरल भाषा में जीवन की बातें कहते थे, जिन्हें बचपन में हम सामान्य समझकर अनसुना कर देते थे। किंतु समय के साथ, जब जीवन अपने विविध रंग दिखाता है और अनुभवों की परतें हमारे भीतर जमने लगती हैं, तब एहसास होता है कि उन सहज वाक्यों में जीवन की सबसे गहरी समझ और वर्षों की तपस्वी अनुभूति छिपी थी।
आज का आधुनिक समाज मृत्यु, बुढ़ापे और क्षय जैसे जीवन के अपरिहार्य सत्यों से नज़रें चुराने की कोशिश करता है। लेकिन हमारी पुरानी पीढ़ियों ने इन्हीं विषयों को ऐसे प्रतीकों, रूपकों और सहज उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि वे भयावह नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा प्रतीत होने लगे। उन्होंने कठिन सत्यों को स्वीकार करने की कला सिखाई, उनसे डरने की नहीं।
परिवार में किसी व्यक्ति के निधन पर हमारे बुज़ुर्ग शायद ही कभी कहते थे कि “फलाँ व्यक्ति मर गया।” वे शांत स्वर में कहते थे, “उनका शरीर शांत हो गया है।” इस एक वाक्य में भारतीय दर्शन की गहनता समाई हुई है। यहाँ व्यक्ति और उसके शरीर को अलग माना गया है। शरीर नश्वर है, किंतु उसके भीतर विद्यमान चेतना उससे कहीं व्यापक और स्थायी।
इसी प्रकार, जब कोई वृद्ध अपनी शारीरिक दुर्बलताओं या बीमारियों का उल्लेख करता था, तो अक्सर मुस्कराकर कहता, “अब ये कपड़े बहुत पुराने हो गए हैं।” यह कथन सीधे उस दृष्टि से जुड़ता है जहाँ शरीर को केवल एक वस्त्र माना गया है, जिसे समय आने पर आत्मा त्याग देती है। इस नज़रिए में बुढ़ापा बोझ नहीं बनता और मृत्यु कोई भयावह अंत नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक परिवर्तन प्रतीत होती है।
पुरानी पीढ़ियों की सोच में जीवन कभी स्थिर नहीं था; वह निरंतर गतिशील यात्रा था। वे कहा करते थे, “ज़िंदगी की गाड़ी चल रही है, पता नहीं कब किसका स्टेशन आ जाए।” इस वाक्य में जीवन की अनिश्चितता को सहज स्वीकृति मिली हुई है। जैसे रेल-यात्रा में मिलने वाले सहयात्रियों से अपनापन तो होता है, पर यह भी पता होता है कि सबका उतरने का स्टेशन अलग-अलग है, वैसे ही यह दृष्टि हमें बिछड़ने के दुःख को समझने और सहने का साहस देती है।
गाँवों में तो प्रकृति स्वयं जीवन का शिक्षक थी। किसी बुज़ुर्ग की अंतिम अवस्था देखकर लोग सहज भाव से कहते थे, “अब तो पत्ता पक गया है।” इस रूपक में कितनी गहरी शांति है! पेड़ पतझड़ से भयभीत नहीं होता; वह जानता है कि पुराने पत्तों का झरना नए जीवन की भूमिका है। उसी प्रकार हमारे बुज़ुर्ग मृत्यु को विनाश नहीं, बल्कि प्रकृति के शाश्वत चक्र का हिस्सा मानते थे, जिसमें पूर्णता और विश्राम का भाव अधिक होता था।
आज का मनुष्य अक्सर संसार की वस्तुओं, रिश्तों और उपलब्धियों को अपनी स्थायी संपत्ति समझ बैठता है। ऐसे समय में बुज़ुर्गों का यह कहना कि “हम तो इस दुनिया में मेहमान हैं” अहंकार को विनम्रता में बदल देने वाला वाक्य था। मेहमान की तरह संसार का उपयोग करना, उससे प्रेम करना, पर उस पर अधिकार का दावा न करना-यह दृष्टिकोण व्यक्ति को लालच, मोह और अनावश्यक तनाव से मुक्त करता है।
वे जीवन को अधिकार नहीं, प्रसाद मानते थे। जब कोई बुज़ुर्ग कहता था, “जितनी साँसें लिखी हैं, उतनी ही चलेंगी,” तो कई लोग इसे भाग्यवाद समझ लेते थे। जबकि वास्तव में यह आने वाले कल की निरर्थक चिंताओं से मुक्ति का सूत्र था। यह वही मानसिक शांति है, जिसकी खोज आज की पीढ़ी ‘स्ट्रेस मैनेजमेंट’ और ‘एंजाइटी रिलीफ’ के नाम पर कर रही है।
हमारे पूर्वज जीवन को “चार दिन का मेला” कहा करते थे, जहाँ मिलना और बिछड़ना दोनों ही स्वाभाविक हैं। मेले की सुंदरता इस बात में नहीं कि वह हमेशा बना रहे, बल्कि इस बात में है कि वह क्षणिक होते हुए भी आनंद, संबंध और स्मृतियाँ दे जाता है। शायद इसी कारण वे जीवन को पकड़कर रखने के बजाय उसे जीने पर अधिक ज़ोर देते थे।
आज जब आधुनिकता की चमक के बीच हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होते जा रहे हैं और बढ़ते अकेलेपन, असुरक्षा तथा मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं, तब बुज़ुर्गों के ये सरल वाक्य फिर से अर्थपूर्ण लगने लगते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी बुद्धिमानी बदलाव को स्वीकार करने में है, उससे लड़ने में नहीं।
उनकी ये छोटी-छोटी बातें आज भी मन पर ऐसी ही ठंडी छाया बनकर उतरती हैं, जैसी तपती दोपहर में किसी पुराने बरगद की छाँव। वे हमें सिखाती हैं कि जीवन को भय से नहीं, सहजता से जिया जाए; मृत्यु को शत्रु नहीं, प्रकृति के नियम के रूप में देखा जाए; और हर क्षण को गरिमा, कृतज्ञता और उल्लास के साथ अपनाया जाए।
शायद यही हमारे पूर्वजों की सबसे बड़ी विरासत है-जीवन के अनिवार्य सत्यों को स्वीकार करते हुए भी जीवन से प्रेम करना, और मृत्यु की स्मृति के बीच भी जीने का उत्सव मनाते रहना।
- डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्ति एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल
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