काव्य :
'प्रेम की परिभाषा'
प्राप्त कर जिस वस्तु को रहती न अभिलाषा कहीं।
कर दे जो पावन विश्व को है प्रेम परिभाषा यही ।।
है यह हृदय की वस्तु आलिंगन न इसका लक्ष्य है।
विरहाग्नि में पलता है जो यह वह अलौकिक वृक्ष है।।
है स्वाद अनुभव गम्य इसका, एक रस रहता सदा।
मिटता नहीं अस्तित्व और बढ़ता क्षण क्षण सर्वदा ।।
है प्रेम ही प्रतिबिंब प्रभु का पूर्ण विकसित रूप है।
है ज्योति उज्जवल प्रेम की, प्रभु पूर्ण ज्योति स्वरूप है।।
सुख से परे है प्रेम और दुख के सदा प्रतिकूल है।
नवनीत सा कोमल है और संताप दायक शूल है।।
कर में रखे मस्तक वही इस मार्ग को अपनाएगा।
"गुप्ता" सदा अद्वैत पद पर प्रेम रस सरसाएगा ।।
- आदित्य हरि गुप्ता , सीहोर
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