ad

प्रेम जन्य अपराध - विवेक रंजन श्रीवास्तव , लंदन



सामयिक आलेख : 

प्रेम जन्य अपराध

- विवेक रंजन श्रीवास्तव , लंदन

    प्रेम मानव इतिहास की वह आदिम और शाश्वत ऊर्जा है, जो जीवन को अर्थ देती है, पर साथ ही वह अग्नि भी है जो मर्यादा की दीवारों को राख करने का साहस रखती है। समाज के ढाँचे को यदि एक स्थायित्व चाहिए, तो वह अक्सर परंपराओं, नियमों और दंड-विधानों के इर्द गिर्द बुना जाता है। इस व्यवस्था में 'अपराध'  समाज का एक अवांछित अंग है, तो 'प्रेम' को समाज ने सदैव एक संदिग्ध, पर अनिवार्य अंग माना है। 
प्रश्न यह है कि जो प्रेम जीवन का उत्सव होना चाहिए , वह हिंसा और छल की विभीषिका में क्यों बदल जाता है?

 इंदौर की सोनम और पुणे की सिया द्वारा अपने प्रेमी की कुत्सित हत्या जैसी घटनाएँ इसी प्रश्न को एक भयावह समकालीन विमर्श में खड़ा करती हैं, जहाँ प्रेम की भाषा में अपराध की स्याही घुल गई है।

भारतीय मनीषा में प्रेम का स्वरूप कभी एक जैसा नहीं रहा। यदि हम 'कामसूत्र' के पन्नों को पलटें, तो वहाँ प्रेम को केवल शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि एक परिष्कृत संस्कृति और परस्पर विश्वास के रूप में स्थापित किया गया है। वहाँ प्रेम के लिए एक स्वतंत्र स्थान की कल्पना थी। परंतु, इसके समानांतर मनुस्मृति और धर्मशास्त्रीय परंपराओं का कठोर अनुशासन भी चलता रहा। यह हमारे सामाजिक इतिहास का चिरंतन द्वंद्व है। एक ओर हमने प्रेम को काव्य माना, दूसरी ओर समय के प्रवाह में उसे कुल और जाति के कठोर अनुशासनों में कैद करने की कुचेष्टा की। जब प्रेम के नैसर्गिक प्रवाह को सामाजिक दीवारों के भीतर जबरन मोड़ने की कोशिश की जाती है, तो वह अपना प्राकृतिक स्वभाव खोने लगता है। और यह  धीरे-धीरे छल, अपराध और घुटन के विषैले अंकुर भी पैदा करता है।

सोनम और सिया की घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि आज का प्रेम जब अनियंत्रित और निकास रहित हो जाता है, तो वह मानवीय संवेदनाओं को त्याग देता है। फिल्मों में भी हमने इस अंतर्विरोध को बार-बार देखा है। कभी 'इश्किया' जैसी फिल्में प्रेम में छिपी उस काली छाया को दिखाती हैं, जहाँ जुनून अपराध का मार्ग प्रशस्त करता है, तो कभी थ्रिलर फिल्में यह दिखाती हैं कि कैसे रिश्तों के झूठ को छिपाने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है।

इंदौर और पुणे की ये समकालीन घटनाएँ मात्र दो व्यक्तियों का अपराध नहीं हैं। यह उस सामाजिक वातावरण की विफलता है जहाँ रिश्तों के टूटने को 'अपमान' से जोड़ दिया जाता है। माता पिता के अहम पर चोट माना जाता है। जब कोई व्यक्ति समाज के डर से अपना सच नहीं कह पाता, या जब वह अपने प्रेम को 'स्वामित्व' समझने लगता है, तब उसे लगने लगता है कि प्रेम को समाप्त करने का एकमात्र तरीका 'सामने वाले को समाप्त करना' है।
 यह हिंसा उस भावनात्मक परिपक्वता का अभाव है, जिसे हमारा शिक्षा तंत्र और पारिवारिक ढांचा कभी सिखा ही नहीं पाया।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि प्रेम का भाव स्वयं में नैसर्गिक स्वरूप में कभी अपराधी नहीं होता। अपराध तब जन्म लेता है जब प्रेम 'उत्तरदायित्व' से मुक्त होकर 'स्वार्थ' और 'स्वामित्व' की बेड़ियों में जकड़ जाता है। जब समाज प्रेम को अनुमति और निषेध के बीच सीमित कर देता है, तो युवा मन संवाद की स्वस्थ भूमि खो देता है। परिणामस्वरूप, संबंध या तो पूरी तरह आदर्शीकृत हो जाते हैं, या फिर वे अपराधीकरण की ओर ढल जाते हैं। 
इन घटनाओं में मीडिया की भूमिका भी कम गंभीर नहीं है, जो अपराध को एक सनसनीखेज कहानी की तरह परोसता है, जिससे समाज में डर तो फैलता है, लेकिन अपराध के पीछे के सामाजिक मनोविज्ञान पर चर्चा कम होती है।
कानून , जुनूनी प्रेम के सम्मुख निर्बल रह जाता है।

इस समस्या का समाधान दंड की कठोरता से परे, सामाजिक चेतना के विस्तार में निहित है। सबसे पहले, हमें परिवारों के भीतर संवाद का एक नया वातावरण बनाना होगा। बच्चों को केवल अकादमिक शिक्षा नहीं, बल्कि भावनात्मक साक्षरता देनी होगी ताकि उन्हें यह समझ हो कि रिश्ता टूटना जीवन का अंत नहीं है। विवाह को एक सामाजिक सौदे से ऊपर उठाकर मानवीय सहमति का क्षेत्र बनाना होगा, जहाँ व्यक्ति अपनी असहमति को बिना किसी डर के व्यक्त कर सके। कानूनों का पालन अपनी जगह अनिवार्य है, लेकिन समाज को भी यह समझना होगा कि किसी भी अपराध को 'प्रेम का नाम' देकर उसे रोमांटिसाइज करना बंद करना होगा।

अंततः, प्रेम और अपराध के इस दुष्चक्र को तोड़ने का एकमात्र उपाय प्रेम को अधिक मानवीय और अधिक ईमानदार बनाना है।
 हमें समाज में ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी जहाँ व्यक्ति का सम्मान उसकी 'मर्यादा' से नहीं, बल्कि उसकी 'संवेदनशीलता' से आंका जाए। जब प्रेम में ईमानदारी होगी, तो उसे छिपाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, और जब छिपाने की जरूरत नहीं होगी, तो अपराध अपनी छाया में स्वतः गुम होकर सिमट जाएगा।
 प्रेम की असली गरिमा उसे अनारकली सा दीवारों में कैद करने में नहीं, बल्कि उसे उत्तरदायित्व और परिपक्वता के खुले आकाश में जीने देने में है।

- विवेक रंजन श्रीवास्तव 
(इन दिनों लंदन में)
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post